कांकड़

गांव-गुवाड़ की बातें

थार की ढाणी

‘थार की ढाणी’ – थार की ढाणी, राजस्‍थान की ढाणियों, चकों, गांवों व लोक जीवन पर आधारित पुस्‍तक है जो थार के लोकजीवन के विभिन्‍न पहलुओं पर विचार करती है. इसमें विभिन्‍न आलेखों के माध्‍यम से जहां थार में जीवन की विकटताओं को बताया गया है वहीं बालुई रेत के समंदर के सौंदर्य की चर्चा भी की गई है. ढाणी यानी थार की सामाजिक संरचना की सबसे छोटी इकाई. आज भी राजस्‍थान की एक बड़ी आबादी का आज भी ढाणियों से कोई न कोई संबंध है. इस पुस्‍तक में ढाणी से बात शुरू की गई है और इसके बहाने समूचे लोकजीवन पर एक सरसरी निगाह डालने की कोशिश है. वहां के ग्राम्‍य जीवन के विविध रंगों, अनूठी विविधताओं, लुप्‍त होती परंपराओं और बदलावों का आइना है यह पुस्‍तक.

जेठ की तपती दुपहरों में, पेयजल की कमी में कैसे कोई सभ्‍यता पलती फूलती है, इसे समझने की कोशिश इस किताब में की गई है. बातें कभी किसी ढाणी, किसी दरख्‍त या कभी किसी गांव के बहाने की गई हैं.  ‘थार की ढाणी’ का विमोचन नयी दिल्‍ली में विश्‍व पुस्‍तक मेले (2010) में हुआ. जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र के प्रोफेसर रामबक्ष ने इसका विमोचन किया.  प्रोफेसर रामबक्ष ने इस किताब को थार के लोक जीवन व लोकसंस्‍कृति पर आरंभिक किताब बताया और इसी दिशा में कुछ और किताबें लिखे जाने की आवश्‍यकता जताई. उन्‍होंने कहा कि थार की लोकसंस्‍कृति पर बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है.

पुस्‍तक थार की ढाणी का विमोचन करते प्रोफेसर रामबक्ष व प्रकाशन विभाग की अवर महानिदेशक वीणा जैन.

इस अवसर पर वरिष्‍ठ लेखक, पत्रकार राजकिशोर तथा नेहरू युवा केंद्र के उपनिदेशक भुवनेश जैन ने भी ‘लोक संस्‍कृति और वैश्‍वीकरण’ विषय पर अपने विचार रखे. साथ ही उन्‍होंने इस तरह की और किताबें लिखे जाने की बात की. इस किताब का प्रकाशन भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने किया है. प्रकाशन विभाग की अवर महानिदेशक वीणा जैन ने कहा कि ढाणी राजस्‍थान की सामाजिक संरचना की सबसे छोटी इकाई है और यह किताब इसी को केंद्र मानते हुए पूरे परिवेश तथा उसके बदलावों की बात करती है. उन्‍होंने कहा कि पुस्‍तक में ढाणी के बहाने राजस्‍थान के लोकजीवन की चर्चा की गई है. थार की परंपराओं और बदलावों के विभिन्‍न पहलुओं को इसमें समेटा गया है.

आवरण – पुस्‍तक  के आवरण पर प्रकाशित चित्र में एक राजस्‍थानी महिला घाघरे कुर्ते के पारंपरिक परिधान में घर के दरवाजे में बैठी है. आवरण सज्‍जा आर के टंडन की है.

भाषा– हिंदी भाषा में प्रकाशित 93 पृष्‍ठों की इस किताब में विभिन्‍न सामयिक चित्र भी दिए गए हैं. इसका मूल्‍य 70 रुपये है.

प्रकाशक- ‘थार की ढाणी’ को भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया है.

कहां से प्राप्‍त करें-  इसके लिए प्रकाशन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर क्लिक करें.   या फोन कर सकते हैं. फोन नं. 011- 24367260, 24365610, 2389205 हैं. एक साथ प्रतियां मंगवाने के लिए आप  (mail@kankad.blog) ईमेल कर सकते हैं.

…………………………………

समाचार -विचार

डेली न्‍यूज, जयपुर.

आज समाज, दिल्‍ली.

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

जनसत्‍ता के नौ मई 2010 के अंक में ‘थार की ढाणी’ की समीक्षा प्रकाशित हुई. यहां साभार चिपका रहे हैं…

……………………………………………………

10 thoughts on “थार की ढाणी

  1. बेहद जानकारी भरी पुस्तक लग रही है, इसे केरल में उपलब्ढ़ करवाने में मदद करे तो अच्छा होगा, मैं पुस्तक मूल्य देने को तैयार हूँ।

  2. lok sanskriti ke nichle star se vishay uthaya h .dhani…ek shabd , ek bhav-chitra , jivan ka ek anootha dhang ,tamaam mushkilon, vishamtao ke bavjood bhi apne vajood ko seena tankar zinda rakhe huye. cover hi sab kuch bayan kar deta h. bahut si shubhkamnaen….

  3. ‘थार की ढाणी’ के गद्य की सरसता हर बार पढो नई सी लगती है, विशेष रूप से उसका बतकहिया अंदाज। रेत के समंदर से निकली इस खुबसूरत सीपी के लेखक को सलाम…
    पुखराज जाँगिड़

कुछ तो कहिए..

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: