कांकड़

गांव-गुवाड़ की बातें

कांकड़

क्‍या और क्‍यों कांकड़ !
कांकड़
यानी गांव की सीमा. गांव की बाहरी सीमा कांकड़ कहलाती है. कांकड़ पर गांव की
सीमा समाप्‍त हो जाती है और ठीक वहीं से दूसरे गांव की रोही शुरू हो जाती है. हर गांव की एक सीमा होती है जहां से उसके क्षेत्र की शुरुआत मानी जाती है इसी सीमा या लाइन को कांकड़ कहते हैं. थार के गांवों में इस सीमा का बहुत महत्‍व रहा है. अनेक रिवाज कांकड़ से जुड़े हैं. तो यही है कांकड़ और ग्रामीण भारत विशेषकर थार में उसका महत्‍व. हर गांव की कांकड़ अपने में अनेक विशेषताएं समेटे होती है. यही कारण है कि प्रत्‍येक गांव की कोई विशेषता होती है, एक पहचान होती है. उनके रीति रिवाज, संस्‍कृति, गुवाड़ें सब कुछ न कुछ अलग होती हैं. विविधिता होती है. गांव की मजबूत भींते और उनके गिरते लेवड़े अनेक कहानियां कहते हैं. इतिहास के सबसे बड़े मूक साक्षी हैं हमारे गांव. गांव को जानना है तो शुरुआत कांकड़ या शुरुआत से ही करनी होगी. यही ब्‍लाग रूपी इस पहल का उद्देश्‍य है.

कांकड़ के 12 साल – कांकड़ ने जनवरी 2021 में 12 साल पूरे कर लिये. इन बारह साल में 161 आलेख, कुल 1,238 से अधिक सार‍गर्भित टिप्‍पणियां और आप जैसे अमूल्‍य पाठक. यही हमारी उपलब्धि है इन बीते सालों की. हम सहयोग, स्‍नेह के लिए आपके आभारी हैं.

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आभार ! गांव की बात करने की इस कोशिश में आपका स्‍नेह व मार्गनिर्देशन अभिभूत करने वाला है. भविष्‍य में भी इसके यूं ही बने रहने की आशा है. रचनाएं अच्‍छी लगें तो लिंक आगे भेजें. हम आपके आभारी रहेंगे.

डिस्‍क्‍लेमर, अगर कुछ है तो.   
इस ब्लॉग पर लिखे गए लेख मूलत: लेखक के विचार हैं या सम्‍बद्ध लोगों से मिली जानकारी और अधिकतम सही सूचना पर आधारित हैं. तथ्‍यों को सही सही रखने की कोशिश की जाती है फिर भी परंपरागत या पीढ़ी दर पीढ़ी आ रही जानकारी में किसी तरह की त्रुटि या कमी के लिए क्षमाप्रार्थी रहेंगे. इस तरह की जानकारी में बदलाव संभव है. अन्‍य स्रोत से ली गई सामग्री का उसके साथ ही उल्‍लेख कर दिया जाता है. ‘कांकड़’ की सामग्री या उसके भाग को पुन: प्रकाशित किया जा सकता है. हां, कांकड़ को क्रेडिट दें. 

संपर्क सूत्र: किसी भी सवाल या सुझाव के लिए कृपया संपर्क करें mail@kankad.blog

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150 thoughts on “कांकड़

  1. आपके कदम तो अवश्य ही मजबूती से बढ़ेंगे, हौसला बुलंद रखें, सूरतगढ़ यात्राओं की स्मृतियाँ ताजा हो गई हैं।

  2. बेहतरीन शुरुआत. इस नयी दुनिया में खुश आमदीद. कुछ कर दिखायेंगे विश्‍वासहै
    सूरज

  3. Prithvi jee,
    This is not a journey of village .it is also a glorious touch of village culture through specific feeling by a very emotional person to the nation as given in past by the CHACHA NEHRU .

  4. very good saheb…आपको तो दूर तक जाना है. नाम प्रभावित करने वाला है… फोटो भी जोड़ें..

  5. hello prithvi ji…
    congratulation for prithvi’s blogs,
    village ke bare me good knowledge dee he… its very good..
    agan congratulation and my good wishes for you….
    dinesh Bansal, SGNR

  6. राम राम सा,
    कांकड़ का इतना नजदीकी और संजीव वर्णन आंखों के समक्ष टूटी भींतें और लेवड़े ला देता है. विश्‍वास है गांवों के बारे में आगे बहुत कुछ पढने को मिलने वाला है, ये सोच ही नई ऊर्जा दे जाती है.

  7. भाजी मजा आ गया वास्‍तव च इंज लगदा जिवें असी पड़ नीं रहे बल्कि खुद उस थां तो पुज गये होइए

  8. well done my dear. Hamesha Rajasthan ke bare me janne ke liye lalayit raha, ummeed hai THAR KE PYASE ke liye aapka blog nakhlistan banega .

  9. I am waiting for your book on Dhani. When I was in Hyderabad I visited one Dolar Dhani there and impressed with whole concept. I hope you will include these Dhanis in your book.

  10. पहली बात, आपके ब्लॉग का लेआउट काफी आकर्षक है। और उससे भी महत्वपूर्ण आपने शुरुआत एक प्रभावी लेख के साथ किया है। जारी रखें

  11. Wow! Actually this effort is very much leek se hatke.

    Amazing write ups on rural India and its rituals. I have spent considerable time in rural India and I know it is altogether a different experience.

    Please keep hindi little simple, this will help you in broadening your audience. All in all a grand effort. (comment on Indiblogger)

  12. आपकी लेखिनी प्रबल है. अवणी से धीरज लिए लिखते जाएँ. प्रशंसा तो भीड़ का धक्का है जो निरंतर चलने वाले पथिक को नहीं चाहिए.

    फिर भी अपनी संतुष्टि के लिए कहता हूँ “बहुत सुन्दर”.

  13. Dear Prithvi,

    It is not unexpected for me but i think is a little bit late but extraordinary. Our soul is made of village’s sand and so that there are some responsibilities, you are going to act in abetter and contemporary way, keep it on. Best wishes.

  14. इंटरनेट पर इस समय हिंदी में काफी कुछ लिखा जा रहा है। ऐसे में आपके ब्लाग में नयापन और ताजगी बरकरार है तो यह काबिले तारीफ है। एक पाठक के तौर पर हमेशा आपका सहयोगी बना रहूंगा।
    अमित पाण्डेय

  15. Dear Prithvi,
    When i come to know about blog named KANKAD it was surprising for me. It is very famous in local dialacts and often used at time of marriage when bridegroom first time come to husbands village. we pray at kankad of the village for our well being and happy life.
    – R.K.Nain, Secretary,MDVS
    Ganganganagar, Rajasthan

  16. prithivji,
    meri parlika yatra par ‘aanibhasha’ me aap ki tippni padhi. aap ke prati man se aabhari hu.
    dainik bhaskar me ‘aapni bhash aapni baat’ colum ke liye aap bhi kuch likhe aur mayad bhasha me likhne wale apne mitro se bhi anurodh kare.
    …..kirti rana

  17. Dear Prithvi,

    Kankad, a line of control we can say Dahliz or limit within we can act freely and that is acceptable to the society. Every person is as being a good nationalist have some social responsibilities to our nation. Ones act effects the social image of family, locaility, society and it made nations image, so we should be aware of our limits.

    Regards

    R.K.Nain

  18. Congratulations Prithvi

    मेरे गांव की मिट्टी मुझसे बहुत मोहब्‍बत करती है, मैंने बस के पीछे आती धूल गांव की देखी है. ..

    Ishwar

  19. आसमां में छेद नजर आता है,
    जरूर पृथ्‍वी ने पत्‍थर उछाला होगा
    लगे रहो अभी डगर बहुत लंबी है…

    with Beeeeeeeeeest wishes.
    – VINOD NOKHWAL, Bhagsar (Pilibangan) Raj.

  20. सुंदर ब्लोग है। शायद यह थार पर लिखा जा रहा एकमात्र ब्लोग भी होगा। बधाई।

    फोंट साइस थोड़ा छोटा लगा, पढ़ने में दिक्कत आई। यदि हो सके तो उसे एक या दो पोइंट साइस बढ़ाएं।

  21. पहली बार आपके ब्‍लाग को देखा और जाना। बहुत अच्‍छी ब्‍लागिंग कर रहें हैं आप। अब नियमित आपके ब्‍लाग पर आना होगा।

  22. You are really proving that Rajasthan is so beautiful, inspiring and simple civilization to the people who don`t know the beauty of DESERT ( the THAR).
    It may have so many problems but it is ours and open to all.

    Padharo mahare desh

    Sadhuvaad

    Ishwar Singh Rathore
    KV Lalgarh Jattan

  23. Bhai Prithviji, Aapka pyara sa sandesh v kankad ke bare me jaankar achchha laga.mera bharpoor sahyog rahega kankad ko.phir jaldi hi milenge.
    Editir, Marwari Digest Monthly, Gyan Bharti Marg, P.O. PARIHARA (churu)

  24. पृथ्‍वी जी ये एक बहुत अच्छी शुरुआत है. इससे शहरों मे रहने वाले युवा वर्ग को गाँवों के बारे में जानने का अवसर मिलेगा. मैंने कांकड़ शब्‍द पहली बार सुना है. आभार

  25. मैंने आपकी लगभग सारी पोस्ट पढ़ी है..!सभी में जमीन से गहरा जुडाव नज़र आता है…मैं भी मूल रूप से हनुमानगढ़ का निवासी हूँ इसलिए आपका लिखा घटनाक्रम जाना पहचाना सा लगता है..!बहुत ही अच्छा लिखते है आप ,चित्र सयोंजन भी लाजवाब है..

  26. झिंडिया नाम का पात्र आपने याद दिलाया और मुझे अपना बचपन याद आया.
    देशभक्ति क्‍या है ?
    अपनी मात़ृभूमि में जो सहजने लायक है उसे सहेजना
    जो संवारने लायक है उसे संवारना और
    जो निर्माण करने लायक है उसका निर्माण करना.
    सहजने, संवारने और निर्माण का आपका यह प्रयास सफल होगा..
    वंदे मातरम
    – ईश्‍वर सिंह ‘विद्यार्थी’

  27. Prithvi g,
    Vande materam.
    गंगानगर में रहते हुए भी मोहन जी आलोक से लंबे समय से बात नहीं हुई थी. आपने नेट के माध्‍यम से उनसे, उनकी नई रचना से और शौक से मिलवाया. धन्‍यवाद.

    -ईश्‍वर

  28. prithvi ji.
    सादर प्रणाम, मैं बीकानेर का रहने वाला हूं. कांकड़ ब्‍लाग देखने के बाद प्रवासी राजस्‍थानी के कारण मेरा राजस्‍थान के प्रति लगाव और ज्‍यादा हो गया. आपका प्रयास सराहनीय है. कोटि कोटि प्रणाम..
    OM PRAKASH BHATTER ,CHANDKHEDA, AHMEDABAD(GUJRAT)

  29. आप राजस्‍थानी भाषा संस्‍कृति सारू जिको कारज कर रिया हो, इन सारू आपने घणा घणा लखदाद. आपसू एक अरज है कि आप भी आपरे ब्‍लाग सूं लोगां ने अपील करो क मायड़ भाषा राजस्‍थानी बोलतां संको मती. हिंदी, अंग्रेजी बोल’र आप बड़ा नि बाजोला. किन्‍हीं राजस्‍थानी मिनख सूं थे हिंदी बोलण री चेष्‍ठा करो तो ओ फुटरो नि लागे, आपरो ओछोपन ही निजर आवै. घम्‍मा घणी सा..
    – विनोद सारस्‍वत, बीकानेर.

  30. Kankad suna suna dekhya pade tavdo jado…… baris re phuvar pade tho bhar javo puro nado.. Harya bharya kheta ri , tu bhaya yad diladi…… Pardesha me bethya ha…. ab pakda la gaon ri gadi…. Kankad me ghusta hi peli thari yad aavli…. ya gadi chutedi sidhi gadh dhankoli javli..

  31. बहुत खूब है भाई आपका कांकड। नहीं हम सब का कांकड।

    -राजू मिश्र

  32. गांव कांकड़ की कहानी पढ़ कर अच्‍छा लगा .
    – मोती खान, धंकोळी

  33. राम राम पृथ्‍वी जी, आपकी बातें पढ़कर ऐसा लगा जैसे हमकुछ पढ़ नहीं रहे बल्कि उस दुनिया को जी रहे हैं. मन में गांव की यादें ताजा हो गईं.

  34. अपनी पंचायल अपना न्‍याय, आपकी कहानी बहुत अच्‍छी है.
    it is very importance people of village is district ganganagar

  35. आपका प्रयास बहुत ही सराहनीय है… आप यूं ही लगे रहें और हमें भी प्रेरित करते रहें..
    -Ajay Kumar Soni “Motyar”

  36. Prithvi G
    खम्‍मा घणी.
    हमारी आत्‍मा हमें हमेशा प्रेरित करती है कि हम अपने अंतर्मन से आत्‍मन के बारे में सोचें. आपने कर दिखाया. बधाई.
    कांकड़ का प्रयास है और रहना चाहिए कि हमारी सामाजिक और भौगोलिक सुंदरताओं के ताने बाने की सुंदरताओं को समझें और सबके सामने भी लाएं. साथ ही समस्‍याओं, विकृतियों और बाधाओं पर भी ध्‍यान दिया जाए. करते चलो.
    मरूधरा ने जो अलबेले व अनूठी बातों तथा यहां के सपूतों के बारे में भी लिखा जाए.
    – ईश्‍वर सिंह विद्यार्थी

  37. पृथ्वी जी, आपके ब्लॉग “कांकण” पर पहली बार आया हूँ। बहुत अच्छा लगा कि आप एक अपने तरह का अनौखा लीक से हटकर काम कर रहे हैं – ब्लॉग की दुनिया में। मेरी शुभकामनाएं ! आपकी पुस्तक “थार की ढाणी” का विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पण हो रहा है, इसकी सूचना मुझे मेल से मिली तभी आपके ब्लॉग का पता चला। मेरी बधाई स्वीकार करें।
    – सुभाष नीरव

  38. श्रीमान, मुझे आप के ब्‍लाग की जानकारी आदरजोग कागद जी से मिली. अच्‍छा लगा आप का ब्‍लाग. ब्‍लाग की वर्षगांठ पर बधाई.. सादर

  39. कांकड़ तो कांकड़ है। अर्थाते अर्थाते शब्द अपनी व्यंजना चूक जाते हैँ क्योँ कि शब्दोँ की भी अपनी कांकड़ होती है।गांव सहित तमाम संज्ञाओं, क्रियाओँ व विशेषणोँ की अपनी हद है लेकिन कांकड़ की व्यंजना तो अनहद से भी आगे है क्योँ कि अनहद की भी तो हद होगी।गांव हमारी हद है।हमेँ हद से नहीँ गुजरना।बस गांव बच जाएंगे।गांव बच गया तो हम भी बचे रहेंगे।लिखते रहो अपनी संपूर्ण तर्कशक्ति -विश्लेषणात्मक दीठके साथ।

  40. बहुत खूब लिखा ही आपने. लिखना जारी रखें, हमारी शुभकामनायें ….!

  41. bhai prithvi ji,
    rajasthan me to shisha mantri re bayan syun rafad mach rei hai ar thai chupp baithya ho. aato ho e ni sakke.mantri ji bolya hai ke rajasthaan ri mayad bhasha hindi hai ar athe pimry education mayad bhasha hindi me direej si.be bhoolgya ke rajasthan ri vidhan sabha rajasthani bhasha ne kendr ri aathvin anusuchi me bhelan ro sanklap prastav dhavnimat syun parit kar rakhyo hai.ek bat or hai ke mayd bhasha me p.edu.devan saru kini bhasha ro aathvin anusuchi me hovan ri darkar e ni.aa bat kanoon e keve hai.fagat ar fagat sarkar ri inchhasagti ri darkar hai.kal ar aaj ra danik bhaskar dekho ar jordar lekhdo likho!aap ri mayad bhasha me bikho padiyo hai ar ba bapdi aap jede sapootan smmi jove.aap khanne khimta,hoons,sabad ane bhasha hai. abhi kalam uthao ar maa boli ro karj chukao.ab chookgya to samjho sat janam tain laj gello ni chhode la.rajasthan!
    jai rajasthani!!
    AAPRO
    OM PUROHIT”KAGAD”
    http://www.omkagad.blogspot.com
    jai

  42. भाई पिरथी जी,
    जय राजस्थानी!
    जय राजस्थान!!
    आज राजस्थान री पिछाण मायड़ भाषा राजस्थानी मेँ बीखो पड़ियो है अर आप रो ब्लाग चुप्प!आ कांईँ बात?बात जच्चण मेँ तो को आवै नीँ पण है जको दिखै ।दिखै जको कै’वण मेँ कांईँ संको?
    *आप रो ब्लाग अब म्हारलै ब्लागड़ै मेँ झाका घालै।गोखो तो सरी ऐक बार!बडी दोरी बिद बैठी है!आज ई ठाह पड़ी कै आपरो ब्लाग word press माथै है अर इण नै फोलो किँया करीजै।ठाह पड़तां ई तो कर न्हाख्यो FOLLOW.अबै कोई टिप्पणती मांड दिराओ देखाण!

  43. prithvi lagata hai aatma-mugdhata ke prabhav men aap bhi bhi hain, jo pahala vichaar aap ke mann men aaya usi par sawaar ho kar chal pade, kam se kam aap aur men panjab se lagate rajasthan ke jis ilaake se hain vahin ke aankade dekhate to yeh mugdhata ka bhaav kafoor ho jata, asaliyat ka saamana karen aur samaaj ko aaina bhi dikhayen yahi vaqta ki zarurat hai.
    bhasha kuchh talkh ho gai hai, kshama karana.

  44. कांकड़ में विचार-मनन-उत्साह-ऊर्जा की शक्ल में जो सब कुछ है, वो इसी तरहा बना रहे, यही शुभ-कामना है पृथ्वी जी.

  45. Deer Prithvi, karib 20 varsh pehle apne kade sanghrash ke saath pen se lekhan ki suruaat Sri Ganganagar ke danik partap keseri se ki thi. mujhe undeno ke sanghrash ki yadaen aaj bhi hai. subhah 10 baje se raat ko 2 baje tak lagataar khabrein lena aur likhna. saath me kamal ji ka margdarshan lena. apko bhi ve din aaj bhi yaad honge. kamal ji birthday 5 jun ko hai. apne new delhi jakar 1 varsh pehle blog ki suruaat ki. koi shak nahi ki ise suru karne me bhi sanghrash kiya hoga. sanghrash hi jindgi hai, jo mout tak jari rehta hai. puri umeed hai ki is sanghrash ko jaari rakhte hua unche pdaw paar karenge. bolg ka 1 varsh pura hone per purani yadoon ko taja karte hua. apko badhai or subhkamnaye- SANJAY SETHI

  46. कांकड़ में विचार-मनन-उत्साह-ऊर्जा की शक्ल में जो सब कुछ है, वो इसी तरहा बना रहे, यही शुभ-कामना है पृथ्वी जी.

  47. भाई पिरथी जी,
    जय राजस्थानी!
    जय राजस्थान!!
    आज राजस्थान री पिछाण मायड़ भाषा राजस्थानी मेँ बीखो पड़ियो है अर आप रो ब्लाग चुप्प!आ कांईँ बात?बात जच्चण मेँ तो को आवै नीँ पण है जको दिखै ।दिखै जको कै’वण मेँ कांईँ संको?
    *आप रो ब्लाग अब म्हारलै ब्लागड़ै मेँ झाका घालै।गोखो तो सरी ऐक बार!बडी दोरी बिद बैठी है!आज ई ठाह पड़ी कै आपरो ब्लाग word press माथै है अर इण नै फोलो किँया करीजै।ठाह पड़तां ई तो कर न्हाख्यो FOLLOW.अबै कोई टिप्पणती मांड दिराओ देखाण!

  48. bhai pirthi ji,
    mayad bhasha re sheva “kankad” main mobi bete re tariyan kar reha ho.sheenv shun shru mayad re baat shagle gaanv (rajasthan)main chouphere fale,r shoyoda,ghalijeda singh(NETA) jaga c aai aas hai.

  49. Dear Prithvi,

    Congratulations on first birthday of Prithvi”s Blog.
    You are so sincere and holy hearted and your work reflects it.
    In real sense you are “Gudadi Ka Lal”.
    We proud of you.
    Regards

  50. भाई पृथ्वी जी,
    आपके इस प्रयास ने युवाओं को अपनी बहुमूल्य विरासत को समझने और संजोने की तमीज सिखाई है। अपनी संस्कृति के उन महत्ती पहलुओ से आपने उन्हें जोड़े रखा, यह आज के समय में बहुत बड़ी बात है. आशा करता हूँ कि यह निरंतरता यूँ ही बरकरार रहेगी और बनी रहेगी उसकी उम्दा गुणवत्ता भी।
    बहुत-बहुत शुभकामनाए…
    आपका फुखराज।

  51. नमस्कार !
    पृथ्वी जी !
    ” कंकड़ ” की दूसरी साल गिरह और नव वर्ष की आप को बहुत बहुत बधाई , ” कांकड़ ” निरंतर नए आयाम प्रस्तुत करती रहे ये हमारी कामना है ,
    बधाई .
    साधुवाद !

  52. आपका ब्लॉग एक नज़र में देखा। सुंदर लगा। लेकिन समय नहीं दे पाया। इसलिए कोई प्रतिक्रिया लिखने की स्थिति नहीं है। यथाशीघ्र पुन: इस ब्लॉग को देखने आऊँगा।

  53. Banja badal mahari chundri , maharo sir puro dhank jay……. Banu binaki bindani , mahro bando hiye lagaya : A though of Unmarried Balika” S.B.Gaur (Dhankoli, Nagour , Rajathan)

  54. PIRATHVI JI APAKA LIKHA BLOG BAHUT ACHHA LAGA ME
    JESE LEKHKKO KI KADAR KARTA HUN APNE HUME BAHUT SE
    SHABDON SE AVGAT KARAYA JINE HUM HAMESA BOLTE HAN
    HIN PAR ASLIAT MALUM NAHI HOTI BAHUT BAHUT BADHAI
    D.P.BASIR [SAIN] HANUMANGARH

  55. PIRTHVI JI APAKA LIKHA BLOG BAHUT ACHHA LAGA ME AAP
    JESE LEKHKKO KI KADAR KARTA HUN APNE HUME BAHUT SE
    SHABDON SE AVGAT KARAYA JINE HUM HAMESA BOLTE
    HIN PAR ASLIAT MALUM NAHI HOTI BAHUT BAHUT BADHAI
    D.P.BASIR [SAIN] HANUMANGARH

  56. काँकड़ री संस्कृति-यात्रा बड़ी चौखी रही। कभी सजग-चौकस तो कभी उनींदी भी लेकिन अनथक। मावठ हो क मेह, इण में सगळा शामिल है। बातां री फुलझड़िरों रो कहणो ही कंई। आशा करूंला कि आगे भी आ यात्रा इणी तरिके जारी रहवेला…
    आपरो – पुखराज।

  57. पृथ्वी भाई साब , आप की मेहनत, आपका हुनर बताता है ‘कांकड’
    इस के जरिए धोरों की धरती से जुड़ने का मौका तो मिलता ही है ,
    साथ ही ज्ञान की गंगा में भी डुबकी लगाने का अवसर मिलता है .
    बधाई आपको इस प्रयास की

    अमित तिवाड़ी , सिरसा (हरियाणा)

  58. बार-बार पुरानी यादों में लौटना अच्‍छा लगता है, वैसे भी आदमी वर्तमान में नहीं जीता। वह या तो अतीत की शरण लेता है या फिर भविष्‍य की वर्तमान कभी शरेण्‍य नहीं होता। अच्‍छा लिखा है साधुवाद।

  59. पहली बार आपके ब्लॉग पे आया, बहुत अच्छा लिखा है आपने .

    एकदम ग्रामीण माहोल में पहुंचा दिया .

  60. क्या शब्दों का जाल बुनते हैं !
    आपने कांकड़ द्वारा लिखने के नए आयाम स्थापित कर दिए हैं
    हर एक आलेख एक नए ही गाँव के कांकड़ पर ले जाता हैं
    जोधपुर से आपका स्नेह भी आपको बेहद परिचित और करीब महसूस करवाता हैं
    Sanjay Sood

  61. म्हारो राजस्थान रंगीलो,प्यारो राजस्थान
    वीरा-धीरा री आ धरती,म्हाने गरव गुमान
    म्हारो राजस्थान रंगीलो,प्यारो राजस्थान

  62. sir….aapki kalam ne gaam ka sach ugal diya…. bahut achha laga…. aapki KANKAD book mero ko rohitash panwar(6H)ne dikhai thi.. maine jab book padi to sach me… aankh me aansoo aa gye.
    thanks

  63. कांकड़ कांकड़ खेजड़ी, पणघट पणघट नीर।
    मिनखजमारे आबरू, मती गवाँज्ये बीर।।
    होळी अर नुवान साल री घणी घणी शुभकामनावां।

  64. काँकड़ पर आकर लगा, जैसे अपने गाँव-गुवाड़ में हूँ। यहाँ आप गाँवों को उनके देशज अंदाज में जिलाए हुए है। इसे बनाए रखें। शुभकामनाएँ।

  65. सर, कांकड़ यानी गांव की सीमा. गांव की बाहरी सीमा कांकड़ कहलाती है. कांकड़ पर गांव की सीमा समाप्‍त हो जाती है और ठीक वहीं से दूसरे गांव की रोही शुरू हो जाती है.

कुछ तो कहिए..

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