हम नलिए हैं। यानी नदी वाले इलाके के लोग। नदी को हमारे यहां नाळी कहते हैं। यह हमारा और हमारी भाषा का टशन है। गंगानगर हनुमानगढ़ इलाके के लोगों काेे बाकी राजस्थान में नलिए कहा जाता है। और हम उन्हें थलिए यानी थल वाले कहते हैं। नलिए यानी उस इलाके के लोग जहां कभी सरस्वती और दृषद्वती और अभी हाल तक घग्गर नदी का पानी सींचता था। कहते हैं कि इसी इलाके के जांगल महावन था। जिसे यहां की मेहनतकश कौम ने इलाके का धान कटोरा बना दिया।

इसी धान कटोरे में इन दिनों खेतों की मूंछें फूट रही हैं। वे किशोरवय से जवान होने जा रहे हैं। इसे गेहूं , सरसों व चने के खेतों की महक से महसूस किया जा सकता है। प्याज व लहसुन की मेड़ों पर दर्ज किया जा सकता है। प्याज, पालक, धनिए और लहसुन की क्यारियों में देखा जा सकता है। टीनेजर खेत, जिन्हें अधिक सारसंभाल व मेहनत की जरूरत होती है। गहरी धुंध, कड़कड़ाती ठंड, पाले और बेमौसमी बारिशों की चुनौतियों से उन्हें बचाया जाना है। लेकिन उम्मीद की दीवारों पर चस्पां अनुमानों के अनुसार धुंध व ठंड के दिन बस जाने को हैं क्योंकि सूर्य का रथ उत्तरायण हो गया है।

इन्हीं दिनों अपने इलाके में लांग ड्राइव पर निकल जाने का आनंद गूंगें का गुड़ है। अपने खेत में पक आई गाजर, मूली और शकरकंद के साथ चली आने वाले माटी की थोड़ी थोड़ी गंध और पड़ोसी के खेत से चुराकर चूसे जाने वाले गन्ने का स्वाद!!! एक दोस्त ने खेत से मैसेज किया कि गुड़ तैयार हो रहा है भिजवाता हूं। लोहड़ी पर इस तरह की मीठी बात करने वाले यार व उनकी यारियां जिंदाबाद!

बाकी क्या है… सरसों के अल्हड़ पीले फूलों को देख अमीर खुसरो याद आते हैं जिन्होंने लिखा था… सकल बन फूल रही सरसों। बात यह है कि इसे मीशा शाफी ने इन्हीं दिनों बड़े दिल व नये ढंग से फिर गाया है। सुनिए (लिंक) और आनंद लीजिए।