बेहतर मौसमों की उम्मीद
वाया अंधकार के धागे

बेफिक्र पड़ी
अपने आप में गुंथी लिपटी
उलझी, रस्सी को
पता नहीं चला
कब चुन लिया गया उसे
रस्साकस्सी के खेल के लिए।

आशीष बिहानी की कविता ‘मोतियाबिंद, आवाजों के’ की ये शुरुआती पंक्तियां अपने आप में बहुत सी उम्मीदों की गांठें खोलती हैं। उनके पास वक्त, काल को आब्जर्व करने की एक नयी दृष्टि है और उसे बयान करने के लिए अनूठे शब्द और बिंब भी। कुल मिलाकर यही उनकी कविताओं की खूबी है। अपने पहले कविता संग्रह ‘अंधकार के धागे’ में जीव विज्ञान का यह छात्र ऐसी ही कई कविताओं से हतप्रभ करता है और कुछ यूं रोशनी के सूत्र रचता है:

झोंपड़ियों और सड़कों के
जंजाल में
एक दीपक कांपते हुए
उच्चारित करता है
रोशनी के सूत्र
और बड़बड़ाते हुए देखता है
हजारों भरी आंखों में
डूबती अपनी छवि
.

आशीष में समसा​मयिक घटनाओं को देखने, आब्जर्व करने की खूबी है तो उसे कागज पर बखूबी उतार देने की क्षमता भी। ये दोनों बातें एक साथ कम ही घटित होती हैं। अच्छा लिक्खाड़, अच्छा वक्ता भी हो जरूरी नहीं है। थार से बंधी अपनी नाड़ और विज्ञान का विद्यार्थी होने का प्रमाण वे अपनी कविताओं में अनेक जगह देते हैं कहते हैं-

चक्रवात नहाया
समुद्र की गोद से उठा
अपनी अकेली
शोरगुल मचाती
आंख से
क्षितिज को देखने लगा.

जैसा कि लाल्टू ने इस संग्रह के आमुख में लिखा है कि आशीष की कविताएं समकालीन हिंदी काव्य परिदृश्य में नये नवेले अहसासों से भरपूर होकर आती हैं। और निसंदेह आशीष अपनी कविताओं में बिंबों, शब्दों, घटनाओं की बयानी और उन पर ​टीका की अपनी शैली से प्रभावित करते हैं। निसंदेह उनकी कुछ और कविताएं कविता संग्रह पाठकों के हाथ में होने चाहिएं क्योंकि ‘अंधकार के धागे’ के जरिए वे हिंदी कविता में बेहतर मौसमों की उम्मीद रचते हैं।

आशीष बिहानी के कविता संग्रह को आनलाइन यहां खरीदा जा सकता है। (क्लिक करें)