रेगमाल, जितेंद्र सोनी

जिंदगी
जब रेगमाल हो जाती है
तो ख्याल खुरदुरे,
सवाल कुंद
और इरादे बुलंद हो जाते हैं।

शीर्षक कविता रेगमाल की ये पंक्तियां पढ़ते हुए जाने माने कवि अशोक वाजपेयी की वह बात बरबस ही याद हो आती है जो उन्होंने इस कविता संग्रह की भूमिका में लिखी हैं। वाजपेयी ने लिखा है कि कई दशकों से कहा जा रहा है कि हमारा समय कविता का समय नहीं है। जबकि कविता का कोई विशेष समय नहीं होता है हर समय कविता का समय है और अकसर कविता समयविद्ध होकर समया​तीत की ओर जाती हैं जो एक स्वाभाविक मानवीय आकांक्षा है।

डा. जितेंद्र सोनी का यह कविता संग्रह रेगमाल वाजपेयी की बात को चरित्रार्थ करता है। अपनी कविताओं में वे कोई बड़ी बात नहीं करते वे छोटी छोटी बातों से उन बड़े मुद्दों को रेखांकित करने की कोशिश करते हैं जो व्यक्ति व समाज के रूप में हमें समय समय पर झिंझोड़ते रहते हैं।

सोनी की कविताओं में बिजूके, कनेर, सीरियाई बच्चे, अबाबीलें, मक्की भूनने वाली महिलाएं, बीरबहूटी,थार,पिंजारे, मश्क, घुड़नाल व लकड़हारे जैसे वे सभी बिंब हैं जो हमारे सामान्य जीवन की चित्र को पूरा करते हैं और वे आह्वान करते हैं कि
रंगदार होने से तो
रेगमाल हो जाना
हमेशा अच्छा होता है।

तो सोनी की कविताएं रंगदारी की नहीं रेगमाली की खुरदुरी कविताएं हैं। उनकी कविताओं में एक मजदूर के शरीर से टपकते पसीने की खुशबू है, मां के बुने स्वेटर के साथ हमारे साथ चलते आशीष हैं, पहली बारिश से भीगी माटी की महक है और वे कहते हैं कि श्वासों से समझौता करके पेट पालना कोई मजाक नहीं।

अपने कहानी संग्रह एडियोस से हतप्रभ करने वाले सोनी ने अपना जादू इन कविताओं में भी बनाए रखा है। दरअसल डा जितेंद्र सोनी की कविताएं हमारे समय को सहज व सरल ढंग से बखान करती पंक्तियां हैं। जरूरी पंक्तियां जिन्हें लिखा जाना चाहिए ताकि कवि और कविता की सार्थकता बनी रहे। क्योंकि उन्हीं के शब्दों में कविताएं शब्दों की कीमियागरी है जो जिंदा रखेगी कविताओं को आपके, मेरे बाद भी आदमियत के रहने तक।

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