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ओम
(थानवी) जी एक बार क्यूबा गए। लौटते वक्त एयरपोर्ट पर उनके सामान की तालाशी ली गयी। उनकी अटैची में सत्रह पुस्तकें चे गेवारा पर सात किताबें फिदेल कास्त्रो पर निकली। जांच अधिकारी हतप्रभ रह गया। उसने ओम जी को सशस्त्र सेल्यूट ठोका। भारत भारद्वाज ने अपने यात्रा वृतांत में यह घटना लिखी जिसका जिक्र शिवरतन जी ने ‘जग दर्शन का मेला’ में किया है।

खाद के कट्टों में भरकर लटान पर रख दी गयी किताबों में कुछ महत्वपूर्ण व रोचक किताबें बंदी (लॉकडाउन) के इस दौर में निकल आई हैं। ऐसी ही किताब जगह दर्शन का मेला में यह रोचक घटना दर्ज है। इस दौर में जब शब्दों की दुनिया फेसबुक की संकरी गलियों व ट्वीटर की बांकी टेडी रपटीली पग​डंडियों में सिमट रही है किताबों को लेकर इस तरह की रोचक घटनाएं सच में सुकूं देती है।

इस बारे में अजब (सिंह) सर की एक घटना याद आ गयी। बीसके साल पहले वे दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास अजमेरी गेट पुल पर बस का इंतजार कर रहे थे। बस नहीं आई तो झोले से किताब निकाली और पढ़ने लगे। पढ़ने में इतने मगन हुए कि पुल के इस छोर से उस छोर तक घूमते घूमते घंटा भर निकल गया। गर्मी के दिनों में एक आदमी पु​ल पर इधर उधर चक्कर लगा रहा है। वहां खड़ी पीसीआर वाले सिपाही को अखर गया। टोक दिया,’भाई साब क्या चल रहा है? चाहते क्या हो।’ अजब जी ने जब उस भले मानस को बताया कि किताब पढ़ते पढ़ते ध्यान नहीं रहा तो उसे मामला समझने में कुछ देर लगी।

यह संयोग ही है कि यह किताबें उलट पुलट हो रही थी कि अजब सर का फोन आ गया। बताया कि वे इन दिनों ग्रेगरी डेविड राबर्ट्स का उपन्यास ‘शांताराम’ पढ़ रहे हैं। ग्रेगरी की कहानी बड़ी रोचक है। कभी चरसी और बैंक लुटेरा रहा फ्रांस का ग्रेगरी भाग कर भारत आ जाता है। वह उपन्यास लिखता है शांताराम जो मुंबई शहर पर लिखी गयी अब तक की सबसे बढ़िया कृतियों में से एक बताई जाती है। खैर, बातों बातों में अजब सर ने इंडियाज साइलेंस रेवोलूशन और सेंटीमेंटल एज्यूकेशन का जिक्र भी कर दिया। आप जानते ही होंगे कि सेंटीमेंटल एज्यूकेशन उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वेश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। यह भी उन अमूल्य किताबों में से एक है जो इस बंदी में निकल आई।

इस कवायद में एक और अद्भुत किताब जो हाथ लगी वह है त्रिभुवन जी का कविता संग्रह ‘शूद्र’। शूद्र कोई बड़ा कविता संग्रह नहीं बल्कि एक लं‍बी कविता का विस्‍तार भर है जो उन्होंने लगभग बीसेक साल में पूरा किया है। त्रिभुवन (भाई जी) शब्दों के सही चयन व उपयोग के प्रति घोर आग्रही हैं इसलिए पत्रकार बिरादरी में उन्हें प्यार व सम्मान से ‘व्‍याकरणाचार्य’ कहा जाता है। त्रिभुवन जी का किताबों के प्रति मोह हमने ‘बचपन’ से देखा है। गंगानगर की पुरानी आबादी में उनके घर के उपर किताबों वाला कमरा हुआ करता था। सही मायने में किताबों वाला जिसमें फर्श से लेकर छत तक, चारपाई के उपर चारपाई के नीचे, चारपाई के बाएं चारपाई के दायें बस किताबें ही किताबें दिखती थी। वे जयपुर से लेकर दिल्ली तक धमक से पत्रकारिता कर चुके हैं। यह बड़ाई की बात नहीं लेकिन इस प्रोफेशन में दो दशक से ज्यादा समय में मैंने देखा है कि किताबों में इतने बड़े स्तर पर निवेश करने वाले वे अपनी तरह के विरले पत्रकार संपादक हैं। उनकी दो किताबें आई हैं पर सौ आनी चाहिए।

बात यही है कि इस सोच व चर्चा के बीच बीते दो हफ्तों में चेर्नीशेव्सकी का क्या करें, बुल्ले शाह, इंडिया ए हिस्ट्री (जॉन की), द वाल (जॉन लेनचेस्टर), ध्यान (जे कृष्णमूर्ति)… कई कई अद्भुत किताबें पूरी हो गयीं। किताबों के बारे में अपना हमेशा यह मानना रहा है कि कोई भी किताब पूरी की पूरी रोचक या अद्भुत हो ऐसा शायद ही कभी होता हो। हां हर किताब में कोई पंक्ति, कोई शब्द जरूर ऐसा होता है जो हमारे अंदर तक ‘स्पार्क’ कर जाता है और लगता है कि किताब पढ़ना सार्थक हो गया। अपने आसपास के हालात को देखते हुए बात अशोक वाजपेयी (कम से कम) की इस बात से खत्म करते हैं कि बड़े स्वप्नों का सूर्यास्त हो चुका है। दुनिया बदलने का काम हमने निर्दय संकीर्ण नायकों के जिम्मे कर उससे छुट्टी पा ली है। हम बहुत छोटे, सीमित, कई बार टुच्चे सपने देखने में व्यस्त हैं। जय हो!