कांकड़

जेठ आषाढ़ के महीनों में धूल जब हवाओं से लिपट बावली हो जाती है तो खेतों में बवंडर उठते हैं। थार में हम इसे भतू‍ळिया कहते हैं। वही जिसके लिए आपके शब्दकोष में बवंडर या वर्लविंड लिखा गया है। ये भतूळिए अपने दायरे में आने वाली हर चीज को झंझोड़ते हुए निकलते हैं। हम बच्चों को कहा जाता था कि भतूळिओं से दूर रहाे क्योंकि इनमें भूतों का वास होता है। कुछ बच्‍चों को यह कहकर दूर रखा जाता था कि भतूळिए वे आत्माएं हैं जो तपते थार में भटकती हैं। ये खतरनाक होती हैं। बहुत बाद में ​पता चला कि भतूळिए का सारा खेल गर्म और ठंडी हवाओं के तेजी से घूमने का है। उसके रंग में बेलौस नाचती बालू का है।

चढ़ते फागुन के साथ आसमान की उंचाइयों को छूने की कोशिश कर रहे बादल बूंदों के रूप में जमीन गिरने लगे हैं। बारिश हो रही है। बर्फबारी हो रही है। दिल्ली से लेकर जोधपुर और कश्मीर से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ों तक। बाहर देश को निकली सर्दियां, एक बार फिर विदा कहने मौसमों की दहलीज पर लौट आईं हैं।

कि मेरे देश में चने जवान होकर ‘होळे’ होने लगे हैं। बाजार की रे​हड़ी पर बीस रुपए किलो के भाव से ​बिकते हरे चनों के गुच्छों में अपनी माटी की खुशबू तो नहीं, हां यादों की महक तो है। तभी तो गर्म होती दुप​हरियों में भूने गए हरे छोले चनों का स्वाद मुहं में भर आता है।

चढ़ता हुआ फागुन, खेतों के सबसे खूबसूरत मौसमों में से एक। जब सरसों, चने और गेहूं के खेत हाथों में हाथ डाल जवान हो रहे हैं। सिस्टम पर नुसरत साहब का मेरे रश्के कमर प्ले कर बालकनी में आ जाता हूं। छत पर सूखने डाल दी गई रजाइयों ने पूछा है- समंदर जहां खत्म होता है वहां जमीन की बही के पांचवें पन्ने पर किसकी खातेदारी है? देखकर बताइएगा!