तालाबआज भी खरे हैं तालाब.. कोई धांसू नहीं बल्कि एक सहज, सरल किताब है. उतनी ही प्रवाहमान जितना की जीवन और जल. इसकी सहजता और प्रवाह ही इसे अनूठा बनाता है. हमारी भाषा में बहुत कम किताबें ही इतनी सरल हो सहज होती हैं. किताब जो जल जैसे जीवन तत्‍व के बारे में सोचने को मजबूर करे. जीवन में जल का महत्‍व है, वह पांच मूल तत्‍वों में है.. बिन पानी सब सून. जल, थल व नभ की सोचने वालों पाठकों के लिए यह अद्भुत, कालजयी पुस्‍तक है.

यह विडंबना है कि कभी जरूरत तो कभी विकास के नाम पर हमने उपलब्‍ध संसाधनों और अमूल्‍य विरासत का सत्‍यानाश कर दिया. उनका कोई विकल्‍प भी हम पेश नहीं कर सके. जीवन से जोहड़ पायतन ही नहीं सिकुड़े, उनसे जुडा एक भरा पूरा समाज गायब हो गया. हमने कभी नहीं सोचा उसके बारे में. कहते हैं कि विकास का कोई विकल्‍प नहीं होता. इस किताब को पढते हुए लगता है कि नासमझी और भेड़चाल का विकास हमें विकल्‍पहीनता की स्थिति में ले जाएगा. अमृता प्रीतम ने कहीं लिखा है कि अकाल सिर्फ खेत खलिहानों में नहीं पड़ते वे कहीं न कहीं हमारे दिल दिमाग में भी तो होते हैं. यह किताब सिर्फ मौसमी अकाल की बात नहीं करती, इतर सूखेपन पर भी टिप्‍पणी करती है, किसी गुरबत की तरह.
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सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्‍य से प्रकट नहीं हुए थे. इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की. यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा हजार बनती थी.पिछले दो सौ बरसों में नए किस्‍म की थोड़ी सी पढाई पढ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्‍य बना दिया.
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अभिव्‍यक्ति पर सुरेंद्र बंसल ने इस विरली पुस्‍तक की समीक्षा में लिखा है कि बहुत कम किताबें ही पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं।

वे कहते हैं कि अपने देश में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी जिसका यह पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अंधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं। पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह बुजुर्गों की तरह बिखरे तालाबों की सुध लेनी शुरू की। इसकी गाथा बेशक लंबी है, लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते हैं।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर बी. आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, ‘अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।’ मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटी। जुलाई 1993 के बाद से इस किताब के विभिन्‍न प्रकाशकों और भाषाओं से अनेक संस्‍करण प्रकाशित हो चुके हैं.

गुजरात से लेकर उत्‍तरांचल, कर्नाटक, पंजाब, बंगाल व महाराष्‍ट्र .. देश के हर राज्‍य हिस्‍से में जल, जमीन से जुडे आंदोलनों में इस किताब की महत्‍ती भूमिका रही है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ सरकारी अधिकारियों व संत महात्‍माओं ने इस पुस्‍तक को केंद्र में रखकर अनेक पहल कीं जिनका सांगोपांग असर क्षेत्र विशेष के जनजीवन पर दिखा. यह पुस्तक फ्रांस की एक लिखिका एनीमोंतो के हाथ लगी। एनीमोंतो ने इसे दक्षिण अफ्रीकी रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के लिए तड़पते लोगों के लिए उपयोगी समझा। फिर उन्होंने इसका फ्रेंच अनुवाद किया।

अनुपमबंसल बताते हैं कि अनेक संस्‍थाएं इस किताब को प्रकाशित कर बांट चुकी हैं. देशभर के १६ रेडियो स्टेशन पुस्तक को धारावाहिक रूप में ब्रॉडकास्ट कर चुके हैं। कपार्ट की सुहासिनी मुले ने इस पुस्तक पर बीस मिनट की फ़िल्म भी बनाई है। सीमा राणा की बनाई फिल्म दूरदर्शन पर आठ बार प्रसारित हो चुकी है। भोपाल के शब्बीर कादरी ने पुस्तक का उर्दू अनुवाद किया और मध्यप्रदेश के मदरसों में मुफ्त में बाँटी। उर्दू तथा पंजाबी अनुवाद पाकिस्तान भी पहुँच चुके है। गुजरात की एक संस्था ‘समभाव’ के फरहाद कांट्रैक्टर पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव पड़ा।

सदियों से ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जाति का विकास मीठे जल-स्रोतों के मुहानों पर ही हुआ। जीवन के राग-विराग मनुष्य ने वहीं पर सीखे, लेकिन विकास की अंधी होड़ में मनुष्य के चारों ओर अंधेरा बढ़ता जा रहा है। इस अंधेरे की बाती को हम सब तथा हमारी तरह-तरह की नीतियाँ-प्रणालियाँ दिन-ब-दिन बुझाने की कोशिश में लगी हुई हैं। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।

(इस समीक्षा में बाद के अंश अभिव्‍यक्ति http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2008/aajbhi.htm में सुरेंद्र बंसल के हैं. कांकड़ ने साभार लिए हैं.)