हमें अपने बच्चों को नसीब की सीढियों का भ्रम नहीं मेहनत के मजबूत पांव देने चाहिएं
कि थार की माटी में दबा दिए गए तरबूजों तक कोई हिम्मती ही पहुंच पाता है.

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कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है: धूमिल

आज जब भी कविता की बात होती है तो दो बड़े सवाल हमेशा सामने आते हैं. प्रकाशक वर्ग कहता है कि कविताएं (वह भी खरीदकर) कौन पढ़ता है;  तो आलोचकों की घोषणा रहती है कि अच्छी कविताएं अब लिखी ही नहीं जातीं. इस लिहाज से देखा जाए तो अभिव्यक्ति और लेखन की यह सक्षम व सुंदर विधा कड़े समकालीन सवालों का सामना कर रही है. कविता के लिए इस संकट को इंटरनेट, सोशल मीडिया व व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग मंचों ने और भी गहरा दिया है जहां कविता के नाम पर थोक के भाव में अधपकी पंक्तियां पाठकों तक पहुंच रही हैं.

लेकिन कविता के मंच पर सबकुछ निराशाजनक भी नहीं हैं. अपने इर्द गिर्द कंटीले सवालों के बावजूद पठनीय और संभावनाओं के नए क्षितिज बुनती कविताएं लिखीं जा रही हैं, छप रही हैं और लोग खरीदकर पढ़ते भी हैं. जितेंद्र कुमार सोनी के राजस्थानी कविता संग्रह ‘रणखार’ की कविताएं भी इसी श्रेणी की हैं. यहां कविता के सामने खड़े हुए एक बड़े सवाल की बात भी करनी प्रासंगिक होगी कि कविता क्या है. कवि चिंतक रामस्वरूप किसान यहां मुक्तिबोध, अरस्तू व धूमिल के विचारों को एक सूत्र में पिरोते हुए कहते हैं कि कविता का समाज से जुड़ाव ही उसे कविता बनाता है. नहीं तो वह रचना और कुछ हो सकती है, कविता तो कतई नहीं. इस खांचे से देखा जाए तो जितेंद्र सोनी की रचनाएं सुखद आश्चर्य की तरह खुद को कविताएं साबित करती हैं.

बड़ी बात यह है कि जितेंद्र सोनी कवि होने से पहले एक सच्चा इंसान होने की शर्तें पूरी करते हैं. ये शर्तें उनकी कविताओं में प्याज के छिलके की तरह परत दर परत उघड़ती जाती हैं. सोनी का यह कविता संग्रह उनके मानव होने का प्रमाण है: रामस्वतरूप किसान

एसिड अटैक
तुम्हारे खातिर एक खबर
फेंकने वाले के लिए एक बदला
पर मेरे लिए
एक त्रासदी है.

जितेंद्र सोनी की कविताओं में मानव रचित और प्राकृतिक.. अनेक विपदाओं पर टीका टिप्पणी है.  वे थार की सांस सुखा देने वाली लुओं के बरक्स् जीवटता को खड़ा कर बताते हैं कि माटी के इस समंदर में परेशानियों की मोटे तनों से मजबूत तो उम्मीदों की कुल्‍हाड़ी है जो उन्‍हें काटती जाती है. वे कहते हैं कि क्रांति की मशालें खाली पेट वाले नंगे पैर लेकर निकलते हैं. कि इंकलाब का पहला और आखिरी नारा इसी वर्ग से लगता है. उनकी कविताएं हरसिंगार, गेंदे, कनेर और गुड़हल के फूलों से गुजर हमारे आंगन में उतर आई धूप की बात करती हैं. वे बताते चलते हैं कि वैश्वीकरण जैसे तमाम नये शब्दों के हमारे शब्दकोषों में शामिल होने के बावजूद सर्वहारा व समाजवाद जैसे शब्दों की प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई है.

जितेंद्र सोनी की कविताओं में बचपना है, बचपन है, पलायन है, धारावी है, एकांत है.. और सबसे बड़ी बात उनमें हमारे आसपास का लोक है. इस दौर में जबकि अंग्रेजी बोलना व अंग्रेजी में लिखना ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है कितने लोग अपनी भाषा बोली में लिखते हैं. आईएएस जितेंद्र सोनी को इस बात के लिए भी सराहा जाना चाहिए कि उन्होंने कविताओं के लिए मातृभाषा राजस्थानी को चुना है. इस तरह से उन्हों ने एक तरह से अपनी रचनाओं को एक पाठक व इलाके तक सीमित रखने का जोखिम उठाने का साहस दिखाया है. जैसा कि रामस्वरूप किसान ने आमुख में लिखा है कि जितेंद्र सोनी का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना जगाता है.

पानी-
थार में
एक सवाल है
पीढियों से

पानी-
बर्फ ही बर्फ होने  के बाद
एक चुनौती है
साइबेरिया जैसे इलाकों में.

आप ग्लोब पर कहीं भी
अंगुली तो रखो
सभी रिश्तों से पहले
मिलेगा
पानी का रिश्ता.

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[भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जितेंद्र कुमार सोनी के राजस्थानी कविता संग्रह ‘रणखार’ को जयपुर के बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. इसे यहां से भी खरीदा जा सकता है.]