kankad_2015

अपने खेत के गन्नों से बने गुड़ की मिठास और अपने आंगन में तारों की छांव में सोने का सुख अलग ही होता है.

चौमासा खत्म हो गया है और कार्तिक हल्की सर्दी के साथ हमारे आंगन में उतर रहा है. आकाश में तारों की म​हफिल जमी है. दिन की गर्मी शायद सुस्ता कर सो गई है और मौसम के मैदान में सर्दी के बच्चों का कब्जा है. थार में रातें अचानक ही सर्द हो जाती हैं. तापमान तेजी से गिरता है. पास की चारपाई पर बच्चे एक दूसरे से गुंथे सो रहे हैं. पायताने पड़ी रजाई उन्हें ओढा देता हूं.

एक से ज्यादा समय तो हो ही गया होगा. मोबाइल पर चलती ‘द व्सिलब्लोअर‘ को रोककर हैडफोन उतारता हूं. मोबाइल की स्क्रीन बताती है कि रात के डेढ बजा चाहते हैं. बाहर बाखळ (बाहरी आंगन) में तारों से छिटकी हल्की रोशनी है. घड़ों का पानी बहुत ठंडा है इसलिए डिग्गी पर नलके से गिलास भरता हूं.

कभी नरमे कपास की बेल्ट रहा यह इलाका गवारी या गवार के दम पर अपने अस्तित्व को बचाए रखने की कोशिश कर रहा है. भारी मुनाफे वाली नरमे कपास की फसल अब लगभग नहीं है. बढ़ते खर्च और घटते पानी और उत्पादकता के बीच किसानों ने गवारी के विकल्प को चुना है पर वह भी दूर तक साथ चलता नजर नहीं आ रहा. भाव नहीं हैं और उत्पादकता भी कम. हरित क्रांति के गीत गाने वालों तथा दूसरी हरित क्रांति का आह्वान करने वालों को इस संकट को बांचना चाहिए कि खेती किस तेजी से घाटे का सौदा हुई है और क्यूं हुई है?

गोबर लिपा आंगन पगथलियों को भीगा सा लगता है. चारपाई पर लौटता हूं तो रजाई की उपरी सतह से नमी हथेलियों पर उतर आती है. बहुत साल बाद खुले आंगन में सोया हूं और आकाश की गंगा, मंदाकिनी कहीं दूर मुस्कुराती दिखती है. उसकी मुस्कुराहट के सदके, अपनी पसंदीदा अदाकारा रेशल वेइज और मोनिका बेलुची को एक साथ एक ही फिल्म में देखने को कल तक के लिए टाल देता हूं. मृत्युंजय की एक बात याद आती है- निद्रा और वचन कभी अधूरे नहीं रहने चाहिए. 🙂