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सूरज ढलने से पहले अस्त होना और रो लेना आंखें सूखने से पहले, बादलों से पहले बरस जाना, बह जाना हवा के आगे आगे.. बीजों सा बिखर जाना और उग आना पहले पौधों से, मरने से पहले जी लेना और मर जाना जीने से पहले .. जीवन की किसी दुपहरी में बड़ के नीचे बड़े बाबा ने इक कमबख्त को यह सीख दी थी. जो बाद वक्त किसी सर्च इंजिन में इसके मायने नहीं खोज पाया तो जोगी हो गया.

कहते हैं कि उस जोगी के कमंडल में कागज के पुर्जों पर लिखे और भी कई सवाल भरे थे. जैसे कि भौतिकी, स्टीफन हाकिंग के भविष्यवाणी के अनुसार खत्म क्यूं नहीं हो गई और भौतिकवाद, एक नये उपभोक्तावाद के रूप में सारे आदर्शों को रौंधता हुआ हमारे सामने आकर खड़ा क्यों हो गया है? कि बारिशें फागण चैत के महीनों में क्यों आती हैं जबकि खेत की गलियां जवान फसलों से लकदक हुई जाती हैं.

और तो और उस जोगी के शरीर पर जमी भभूत स्मार्टफोन से उड़े आते इन सवालों को छुपा नहीं पाती कि क्या क्रांतियां लोगों को ठगने/भ्रमाने का जरिया हो गई हैं? कि एक क्रांतिकारी, दूसरे क्रांतिकारी के पैरों के नीचे के जमीन खींचकर अपना कौनसा धरातल मजबूत कर रहा है. कि यह सारा भ्रम ही है जो हमेशा किसी अवतार के इंतजार में रहे इक समाज के सामने रचा जा रहा है. सब मिथ्या है, सुबह शाम लगने वाली भूख के सिवा?

बताते हैं कि इस जोगी ने दुनिया की किसी बड़ी अदालत में सारे सर्च इंजिनों के खिलाफ मामला दर्ज कराया कि उन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे जमीनी सवालों की खोज करने पर उनमें ‘इन्फोरमेशन नाट फाउंड’ का संदेश आता है. बल्कि ये सर्च इंजिन सुझाव देते हैं कि आप ‘दुनिया के दस श्रेष्ठ क्रांतिकारी’ या ‘साल 2014 के सबसे शक्तिशाली क्रांतिकारी’ पर सर्च करें. जोगी के अनुसार यह मूल प्रश्नों से भटकाने की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चाल है क्योंकि सारे सर्च इंजिनों पर उन्हीं का कब्जा है.

इस जोगी को दिल्ली के रामलीला मैदान और कभी जंतर मंतर पर दायें वाली स्टालों पर अजीब से सवाल करते भी देखा गया. बताते हैं कि इस जोगी के कमंडल से एक बार कागज का एक पुर्जा निकलकर गिर गया जिस पर लाल स्याही में लिखा था-

हम लू, आंधी और सूखे के लिए बने,
कि बारिशें
हमारी किताबों के हाशिए पर नुक्तों की तरह दर्ज हैं.