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अपने समय से चार घंटे देरी से चलती ताज एक्सप्रेस आगरा से निकले के बाद ही एक्सप्रेस जैसी चलने लगी है. कुहरे के बंधन कमजोर हो रहे हैं और दूर आसमान में सूरज टंगा दिखता है. शायद धुंध का राज खत्म हो रहा है. जमीन से ऐसी नाड़ बंधी है कि पेड़ पौधे व झाड़ियां, जमीन, लोग देखकर ही अपनी माटी की खुशबू आ जाती है. लगा कि अपना देस है और धौलपुर के इलाके वाला बोर्ड लगा दिख गया. 
 
तो, अपनी अल्हड़ता से बहती चंबल के उपर से गुजर रहे हैं. पुल से चंबल कितनी सुंदर, प्यारी दिखती है. यह देश की सबसे निर्मल नदियों में से एक है. यानी मानवीय व औद्योगिक प्रदूषण से बची हुई. इसे देखकर हम अपने देश की नदियों पर संतोष व गर्व कर सकते हैं. कि यह किसी भी महानगर को छूती हुई नहीं निकलती. इसी पुल के खत्म होते ही चंबल की विश्व विख्यात घाटियां हैं. चंबल के दस्युओं की कहानियों में वर्णित और फिल्मों में दिखी तस्वीरों से कहीं अधिक सुंदर और लुभावनी. थार के धोरों यानी रेत के टीलों व अरावली की पहाड़ियों जितनी ही मनमोहक. किसी गिलहरी के शरीर पर लहराती धारियों सी. बांयी ओर की खिड़की से देखते हुए उर्वी कहती है— वॉव, क्या हम यहां घूम नहीं सकते. मैंने कहा क्यूं नहीं. दिन के उजाले में एक सीमा तक तो जा ही सकते हैं. 
 
शायद कभी चंबल की घाटियों की सफारी हो. आखिर पता तो चले कि 18 लाख हेक्टेयर में फैली यह प्रकृति की लीला अपने भीतर कितने रहस्य समेटे हैं. कितनी सुंदरता इनकी खंदकों में छुपी हुई है. ऐसा होगा यह निश्चित नहीं क्योंकि ग्वालियर में एक अंग्रेजी अखबार की खबर बताती है कि प्रदेश सरकार ने इन घाटियों को एकसार कर खेती करनी चाही है. सरकार उद्योगों के लिए इन मनोहारी घाटियों के ए​क हिस्से को समतल करने का काम पहले ही शुरू कर चुकी है. कितने देशों में इस तरह का विशिष्‍ट प्राकृतिक सौंदर्य है? जिन विविधिताओं को सहेजा जाना चाहिए हम सबसे पहले उन्‍हीं को निशाना बनाते हैं; पता नहीं विकास की कीमत हमेशा प्रकृति को ही क्यों चुकानी पड़ती है? 
 
शहर लौटता हूं तो हवाओं में नारे और दीवारों पर क्रांति के चमचमाते पोस्टर हैं. शहर में इन दिनों इतिहास की बुनियाद पर नया भविष्य बनाने वाले मिस्त्री करंडी, सूतली लेकर आए हुए हैं. वे खुद को स्वयंसिद्ध बताते हैं तो नए दिनों का दावा करने वालों के झोले में कुछ दिनों की कथित उपलब्धियों से भरे आधे अधूरे सर्टिफिकेट हैं. बड़े बुजुर्गों ने हमें तपती दुपहरियों व ढलती रातों में जिन चौराहों से बचने की सलाह दी थी जिंदगी की सड़क हमें वहीं पर ले आती है. कल तक जिन हाथों में देश के झंडे थे आज वही साफ सपाट डंडे लिए खड़े हैं. जिन्हें क्रांति का अगुवा कहा गया था वे जमीनी युद्ध मैदानों के भगौड़े साबित हुए. मीडिया हमारे चारों ओर अफवाहों और अर्धसत्यों का चक्रव्यूह रच रहा है और सयाने कह गए हैं कि आधा सच, झूठ से भी अधिक खतरनाक होता है. 
 
साबिर का शे’र है-
सूखी रेत समझ के राही डूब गए,
बाढ का पानी कैसी दलदल छोड़ गया.
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