तुम इन बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहो
तुम इन नजारों के अंधे तमाशबीन नहीं.

अंधेरा कितना भी घना हो उसका कोई मोल नहीं होता और रोशनी कितनी भी कम हो, अनमोल रहती है. कहानी की शुरुआत कुछ यूं है कि एक समाज कई दशकों से अंधेरा ढोने को अभिशप्त था और इस पंक्ति के साथ खत्म हो जाती है कि वह समाज कई और दशकों के बाद भी उसी अंधेरे को ढोने के लिए अभिशप्त रहा. इसलिए वहां रोशनियों का कारोबार नहीं चला. इस कहानी के बीच में, नुक्तों में, क्षेपकों और टिप्पणियों में सिर्फ और सिर्फ अंधेरा है. बस कहानी का शीर्षक ‘उजालों की तलाश’ है.

असल में एक गांव के बाहर वाले बास में एक लंबरदार अपने परिवार के साथ एक बड़े से घर में रहता है. यह महीने के उस पखवाड़े की बात है जब रातों को चांदनी की फसलें खिली होती है. यानी शुक्ल या चानण पक्ष की एक रात लंबरदार का परिवार बाहर वाले कमरे, बैठक में किसी गंभीर पारिवारिक मुद्दे पर चर्चा कर रहा था कि अचानक रोशनी चुक गई. मामले को गोपनीय बनाये रखने के लिए सभी नौकर, बांदियों को पहले ही छुट्टी दे दी गई थी और चौधरी के परिवार में किसी को रोशनी करनी आती नहीं थी. बैठक में घुप्प अंधेरा जबकि बाहर गली चांदनी से चमक रही थी. किसी को नहीं सूझा कि क्या किया जाए? इसी दौरान परिवार के एक सदस्य ने सुझाव दिया कि क्यों न मिलकर अंधेरे को बाहर ढो दिया जाए ताकि रोशनी अंदर भर सके. बस फिर क्या था परिवार के सभी लोग बट्ठल बाल्टी लेकर शुरू हो गए. वे अंदर से अंधेरा भरकर लाते और बाहर उलीच देते. उन्हें लगता अंदर अंधेरा कम और बाहर घना हो रहा है. वास्तविकता कुछ और थी. दिन चढने की आहट के साथ बाहर रोशनी की कोंपल फूटने लगी. तड़के तड़के जंगल जाने को निकले एक बुजुर्ग ने इस परिवार की हरकत देखी तो उसने पूछा कि भाई तुम लोग क्या कर रहे हो. परिवार वालों ने बात बताई और कहा कि वह तो अंधेरा बाहर ढो रहे हैं. उसने पूछा अंधेरा कहां है? जवाब मिला-भीतर (हालांकि उनका आशय अंदर यानी कमरे में था). बुजुर्ग मुस्कुराकर आगे बढ गया.

नहीं, यह मूल कहानी नहीं है. यह तो एक बात है जो मूल कहानी के पहले पन्ने पर फुटनोट के रूप में डाली गई है ताकि यह समझने में आसानी रहे कि अंधेरा ढोने का मतलब क्या है और हमारे आसपास के लोग या हम ही रोशनी की तलाश में क्या ढो रहे हैं. दरअसल इस कहानी के क्षेपक में दर्ज है कि अंधेरों का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता. वे तो प्रकाश यानी रोशनी के इलाके में अतिक्रमण भर हैं. प्रकाश की अनुपस्थिति है. विज्ञान के हवाले से कहानी में बताया गया है कि प्रकाश का वेग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकंड है और वेग के लिहाज से कोई भी उसके पासंग नहीं है. ध्वनि भी नहीं. लेकिन विज्ञान यह नहीं बताता कि अंधेरा किस गति से हमारे भीतर पैठ कर जाता है.

लेखक ने सवाल उठाया है कि अगर एक कवि ‘आज की कविता, अंधेरे की व्यथा है’ कह सकता है तो एक कहानीकार अंधेरे की किस्सागोई क्यों नहीं कर सकता?

अंधेरे के पक्ष में लेखक के अपने तर्क और तीर हैं. जैसे सयाने कहते हैं कि अंधेरा मानव स्वभाव है. प्रकृति का मूल है. मिथकों के अनुसार सृजन के समय हमारी धरती आग नहीं अंधेरे का गोला था. काले कुट अंधेरे से भरी हुई. सृजक को सारा मामला बड़ा विचित्र लगा तो उसने ‘लेट देयर बी लाईट’ कहा और हमारी दुनिया रोशन हो गई. एक पतली लकीर से बंटा आधा हिस्सा रोशन हो गया. अंधेरा समझ में आने लगा. तो कहानी यह बताती हुई चलती है कि अंधेरा हमारे सिस्टम में इनबिल्ट है, प्रीलोडेड है. बस वह सुशुप्त या इनएक्टिव बैठा रहता है मौके की तलाश में. कि अंधेरा हमारा मूल है और रोशनी हमारा मोक्ष. हालांकि नाम से लेखक उतना गुणी ज्ञानी नहीं दिखता लेकिन उसने अपने इस तर्क में महात्मा बुद्ध की इस सीख का हवाला दिया है—अप्प दीपो भव. कि खुद प्रकाश बनो. रोशनी अंदर से आती है.

चूंकि इस कहानी में कहानीकार के सारे तर्क अंधेरे के पक्ष में हैं तो आप कह सकते हैं कि अंधेरों की यूं बात करना लेखक की निराशा को दिखाता है. यह निराशावाद है. अंधेरों का षड़यंत्र है. आरोप तो यह भी है कि अंधेरों का जनसंपर्क (पीआर) का काम देखने वालों ने यह कहानी प्रायोजित की है. इस बारे में लेखक ने एक लाइन का जो पूर्व स्पष्टीकरण लगाया है उसके अनुसार- अंधेरों का दर्द या सच्चाई जाने बिना हम रोशनी की कद्र नहीं कर सकते. बल्कि उसने सवाल उठाया है कि अगर एक कवि ‘आज की कविता, अंधेरे की व्यथा है’ कह सकता है तो एक कहानीकार अंधेरे की किस्सागोई क्यों नहीं कर सकता?

[शुरुआती पंक्तियां दुष्यंत कुमार]