लोकतंत्र की सफलता की पहली शर्त यह है कि ज्यादातर लोग ईमानदार हों.

शराब के ठेके पर इस पोस्टर पर लिखा है-आपका वोट कीमती है उसे शराब के बदले ना बेचें.
शराब के ठेके पर इस पोस्टर पर लिखा है-आपका वोट कीमती है उसे शराब के बदले ना बेचें.

बामसेफ से एक राजनीतिक तूफान में बदली बसपा के सुप्रीमो काशीराम उन दिनों सामाजिक क्रांति के झंडाबरदार थे और वाजपेयी जी बड़े स्टाइल में ‘दिल्ली की किल्ली घुमाने’ की बात करते थे. एक दोस्त पायल टाकीज रोड पर कैसेटों में गाने भरा करता था जिससे ‘स्‍पाइस गर्ल’ के गाने भरवाने के बाद यारों को हर रविवार लगने वाले लंगर का बेसब्री से इंतजार रहता. कि क्रांतियों का इतिहास, भूख से खड़ा होता है. कहते हैं कि पायल टाकीज के उस मकान को तोड़कर दुकानें बना दी गई हैं जहां कुछ सिरफिरे देर रात डैक में फुल वोल्यूम पर ‘ला बोशे’ बजाया करते थे.

यादों की पुरानी गलियों में होली खेलकर निकली हवा कुछ ज्यादा ही खुल गई है शायद. नीम के पत्ते झर रहे हैं तो पीपल भी उदास है. सुबह-सुबह सड़कें नीम व पीपल के पीले पतों से भरी मिलती हैं. दुनिया के नक्शे पर नये देशों के जन्म का समय… जब कहीं मातम हुआ तो कहीं थाल बजे. साउथ सूडान के नामकरण में बैंड बाजों के साथ शामिल हुए देश क्रीमिया को रूस की अवैध संतान बताकर खारिज कर देना चाहते हैं. शायद वे भूल गए कि एक खेत में फसल पकने से पहले ही दूसरी जगह कोई फसल बोई जा चुकी होती है. सुनने में आया है कि दुनिया के सिमटकर बच्चों के माउस में आ जाने के दावों के बीच एक भरे पूरे बोइंग जहाज को हवा निगल गई तथा हवाई यात्रा के और सुरक्षित होने का भरोसा सुदूर हिंद महासागर में 400 वर्ग किलोमीटर के इलाके में बिखर गया है.

हैरान कर देने वाली खबरों के बीच एफएम पर देश को बचाने की सौगंध खाई जा रही हैं तो पद प्रतिष्‍ठा को मोक्ष मानने वाले टिकट न मिलने पर निष्‍ठा और नैतिकता के सारे खूंटे तोड़कर भाग गए हैं. कुछ आस्‍थाएं यूं बदली हैं मानों सूरज ने धरती के चक्‍कर लगाने शुरू कर दिए हों. कुछ राजनीतिक दलों के नारों में तो कुछ के कर्म में व्‍यक्ति पूजा है.बाकी के एजेंडे में किसी न किसी तरह सत्ता में बने रहना है. उनकी सोच सत्ता में आने वाले दल के अनुसार ही बदल जाती हैं.खुद को बेहतर साबित न कर दूसरे को बदतर बताने की होड़ मची है. सच्‍चाई मौन है, झूठ चिल्‍ला रहा है और हम कहते हैं कि देश में लोकतंत्र का पर्व है! सच मौन है, झूठ चिल्ला रहा है और हम कहते हैं कि देश में लोकतंत्र का पर्व है! सच में तो यह झूठ का जलसा लगता है. अगर नहीं तो ऐसे पदलोभुओं, मुद्दों की बात के बजाय अगड़म बगड़म कर रहे लोगों व अच्‍छे ईमानदार दावेदारों को नकार देने वाले दलों को हार क्यूं नहीं जाना चाहिए?

रस्किन बांड ने देहरा गांव में रहते हुए एक रोचक वाकया लिखा था. एक कुबडे़ भिखारी गणपत का. गणपत ने अपने कुबड़े होने की जो नाटकीय कहानी बताई उससे अधिक रोचक उससे मिली शिक्षाएं है जैसे कि जनतंत्र की सफलता की पहली शर्त यह है कि ज्यादातर लोग ईमानदार हों. और कि आजादी वह चीज है जिसके लिए लगातार आग्रह करते रहना होता है. उन्हें पढते हुए दुष्यंत कुमार की यह गजल याद आती है—

यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा.
यहां तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा.

इस बार सीधी अंगुली का सही इस्तेमाल नहीं किया तो सच में पानी यहीं ठहर जाएगा.
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[फोटो साभार फेसबुक ]