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कूदा तिरे घर में कोई यूं धम्म से न होगा
वो काम किया हमने कि रुस्तम से न होगा.

हाइवे पर इससे अच्छी टिप्पणी क्या होगी? दरअसल जिंदगी में सबसे अच्छी घटनाएं वे होती हैं जो यूं ही घटे. अनायास. बिना किसी प्लान, बिना सोच विचार के. फागुन की सर्द सी सुबह में अचानक देखा कि शहतूतिए लगने लगे हैं और घर लौटकर यूं ही बोलेरो क्लास पढने लगा जो पिछले साल के पुस्तक मेले में खरीदी थी. दोपहर में अनायास ही बेटी के साथ हाइवे देखी और पार्टनर ने शाम को फ्रूट कस्टर्ड बना लिया. ऐसे ही एक दोस्त ने इंतिजार हुसैन का यह शेयर मैसेज किया तो लगा कि हाइवे पर दो पंक्तियों में इससे अच्‍छा कुछ नहीं कहा जा सकता. 

हाइवे हिंदी​ दर्शकों के लिए अनायास घटित हुई सुखद घटना जैसी है. इसे इस साल देखी जाने वाली हिंदी​ फिल्‍मों की सूची में शामिल करने के कई कारण हैं. कि यह हमारे यानी हिंदी सिनेमा के चालू मुआवरों को तोड़ती है. कहानी, अभिनय, फोटोग्राफी जैसे मानकों से इतर हाइवे सिनेमा के समाज से संबंध तथा समाज में सिनेमा की प्रासंगिकता के सवालों पर नये सिरे से विचार का मौका देती है. हाइवे में निर्देशक इम्तियाज ने वह कठिन राह चुनी है जिसे आमतौर पर कुछ ही लोगों के लिए आरक्षित राजमार्ग माना जाता है. यह संभावनाओं की नयी खिड़की है. 

सिनेमा के समाज से संबंध की बात करते समय इस साल आस्कर की दो चर्चित फिल्में टवेल्व ईयर ए स्लेव तथा डलास बायर्स क्लब देखें. वे सिनेमा की प्रासं​गकिता व इसके होने का सबसे बड़ा उदाहरण है. दोनों ही फिल्में सत्य घटनाओं पर आधारित हैं. सिनेमा ऐसा ही होना चाहिए प्रासंगिक व सच के धरातल पर कल्पनाओं की उड़ान. इम्तियाज ने एक साक्षात्कार में कहा था कि कला को, सिनेमा को अप्रासंगिक (इर्रैलेवेंट) नहीं होना चाहिए. यानी ​मनोरंजन के बिना सिनेमा की कल्पना नहीं की जा सकती लेकिन मुझे लगता है कि समाज में प्रासंगिक हुए बिना मनोरंजन भी नहीं हो सकता. तो इम्तियाज के शब्दों में ही वे अपनी फिल्मों में यथार्थ में कल्पना का शौंक लगाते हैं और सच में झूठ को मिलाते चलते है. यही एक बेहतर वाणिज्यिक सिनेमा के लिए आदर्श स्थिति है.

जबकि प्रभात रंजन ने एक जगह लिखा है कि आदमी ऐसा प्राणी है जिसकी सोच सबसे ज्यादा बदलती है. और कि बाजार बनती इस दुनिया में हर कोई अपने हुनर को बाजार में बेच देने को बेचैन नजर आता है. ऐसे में कैसे विश्वास करेंगे कि इस दौर की सबसे वर्सटाइल आवाज की धनी दो बहनें [नूरां बहनें] कई साल से पंजाब के गांव में सूफियाना संगीत में रमी हुई हैं. अपनी कला पर ‘नॉट फोर सेल’ का टैग लगाए हुए. टुंग-टुंग के बाद उन्हें हाइवे में एक और सूफी कलाम में सुनना सुखद आश्चर्य है. इसलिए यह सवाल नहीं उठता कि यह किसकी फिल्म है. इम्तियाज की, रणदीप हुड्डा की या आलिया भट्ट की. नूरां बहनों की,  ए आर रहमान की या कि पूरी टीम की. निसंदेह पूरी टीम की. इम्तियाज को श्रेय इसलिए दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अपनी टीम को बड़े सलीके और संजीदगी से चुना और टीम के सदस्यों को बड़प्पन इसमें है कि उन्होंने अपने अपने हिस्से को पूरी लगन से पूरा किया.

खोदा और ले भागे की अमेरिकी अवधारणा के पीछे दौड़ रही इस पीढी में कितने लोग हैं जो एक सपने को 15 साल तक सीने से चिपकाए बस एक मौके का इंतजार करते हैं. इम्तियाज ने हाइवे के लिए किया. एक आइडिए को फिल्म में बदलने के लिए इतना लंबा इंतजार कि जो आलिया उनसे बच्ची के रूप में मिली थी, एक षोड्षी के रूप में उनकी फिल्म की हीरोइन बन गई. हां, यहां थिन रेड लाइन के टेरेंस मेलिक याद आते हैं. मेलिक ने साल 1978 में डेज आफ हेवन बनाई. इसके बाद सार्वजनिक जीवन से एक तरह से गायब हो गए और 20 साल बाद थिन रेड लाइन का निर्देशन किया जो अब तक की सबसे बढिया वार मूवी में से एक है. मेलिक ने अपने चार दशक से अधिक लंबे करियर में केवल आधा दर्जन फिल्‍मों का निर्देशन किया है. खैर बात हाइवे की. ईरानी फिल्‍मकार अब्बास कियारोस्तमी ने एक बार कहा था कि अच्‍छा सिनेमा विश्‍वसनीय होता है, जिस पर हम विश्‍वास कर सकें और खराब सिनेमा अविश्‍वसनीय. जब वी मेट से लेकर हाइवे तक, इम्तियाज का सिनेमा भरोसा करने लायक है. हाइवे उसकी एक और मजबूत कड़ी है.

इम्तियाज के लिए सुरजीत पातर के शब्द-
युगां तों काफ़ले आए ने इस सच दा गवाह बणदे,
मैं राहां ते नहीं तुरदा, मैं तुरदा हां तां राह बणदे.
[सार कि मैं राहों पर नहीं चलता, मैं चलता हूं तो राहें बनती हैं.]

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बोलेरो क्‍लास, प्रभात रंजन का कहानी संग्रह है जो प्रतिलिपि प्रकाशन ने प्रकाशित किया.  फोटो इंटरनेट से साभार.