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विज्ञान को आज भी मालूम नहीं कि मरने से पहले आदमी किस तरह मर जाता है. किस तरह पूरे भीगे हुए आदमी को एक आंसू की गरमी महसूस हो जाती है. इसलिए उसे प्राणी शास्त्र के रिसालों में खास दिलचस्पी कभी नहीं रही. [कहानी-धूप के आईने में]

मैंने बाबा को कभी किसी पूजा पाठ में शामिल होते नहीं देखा. जिंदगी हमें साथ रहने का जितना मौका देती है उसमें शायद ऐसी किसी बात के लिए समय ही नहीं निकलता. हां, एक बार गेहूं से भरे खेत में उन्होंने कहा था कि बेटा भले किसी के भी आगे सर मत झुकाओ लेकिन इस माटी की कद्र जरूर करो. क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी सचाइयों में से एक सच यही है. किसान के लिए खेतीबाड़ी और आमो खास के लिए माटी! बाबा की इस सीख को आगे बढाते हुए ही शायद किशोर चौधरी ने लिखा है कि स्वर्ग नरक कुछ नहीं होता है. आदमी इस मिट्टी से जन्मता है और इसी में खत्म हो जाता है. ये धरती काल है. माया है. कुदरत की अनूठी कारीगरी है. ये धरती जीवन है. ये धरती कमली है.

क्रिस्टोफर नोलान की ‘अंडर द आई आफ द क्लॉक‘ पढ़नी शुरू ही थी कि बेटी पूछती है— शह​तूतिए गर्मियों में होते हैं या बारिश में?  शहतूतिया उसका फेवरेट है जो हम रेललाइन के पास वाले पार्क में यूं ही तोड़ कर खा सकते हैं. फ्री में! सोचने लगता हूं कि अभी तो शहतूतिया बसंत की अगवानी में नाई की दुकान से निकला रंगरूट हो रहा है. बिना पत्तों का. तो शहतूतिए तो गर्मियों के आसपास ही होंगे. इतने में ही कूरियर आ जाता है और ‘धूप के आईने में’ लेकर. किशोर चौधरी का नया कहानी संग्रह. अपनी माटी की खुशबू में चित्त ऐसा बंधा कि ​क्रिस्टोफर अगले कुछ दिनों के लिए टल जाते हैं.

कि इस दुनिया में असंख्य लोग खुशबुओं की चादरें सर पर उठाए हुए मुहब्बत की पुरानी मजारों की चौखटें चूमते रहते है. और मुहब्बत कहां हर किसी के साथ होती है. यह तो अद्भुत घटना है जो लाखों में से किसी एक साथ घटती है. यूं ही नहीं वक्त की अमृता अपनी अंगुलियों से इमरोज की पीठ पर साहिर के नाम लिखती रहती.

तो, इस सदी को भागे हुए लोगों की सदी कहकर अपने पहले कहानी संग्रह ‘चौराहे की सीढियों’ से चौंका देने वाले किशोर चौधरी का यह दूसरा कहानी संग्रह है. जिसमें में इस दौर की पीढ़ी के संकट को रेखांकित करते हुए कहते हैं— किस्मत को चमकाने वाले पत्थरों के रंग अंगुलियों में पहने पहने धुंधले हो जाते हैं. अफसोस जिंदगी में कुछ खास नहीं. एक लड़की से प्रेम है. उसके लिए कुछ लम्हे चाहिए. बात इतनी सी है कि हर चाय की अपनी औकात होती है. तीन उबाल के बाद वह अपनी औकात में आ ही जाती है.

इस किताब की अलमारी में पेज 9 से 118 तक में फैली छह कहानियां हैं.कुल जमा जिंदगी रेत का बिछावन है और लोकगीतों की खुशबू है. दूर थार के किसी सुनसान कोने में बैठा एक किशोर हमारी भाषा में दिल की छू लेने वाली पंक्तियां लिखता है. इस मुनाफाखोर समय में इससे बड़ा सुकून और क्या हो सकता है?

सिस्टम में वडाली बंधुओं की अगली पीढी की प्रतिभा लखविंदर वडाली को गाते हुए सुनता हूं. मास्टर सलीम ने उनकी प्रशंसा में कहा कि सुरों की समझना और समझकर गाना सबसे मुश्किल होता है.. लखविंदर में वह काबिलियत है. अगर कहानी के लिए यही बात कहनी होती तो किशोर चौधरी के लिए कही जाती. कि उनमें कहानी कहने का दम व सलीका है. उन्हीं के किरदार के शब्दों को चुराकर कहा जाए तो- पांव फैलाकर बैठिए. जब खुद को समझना हो तो किसी को कुछ मत समझिए.

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[कमली, कमला का एक अपभ्रंश रूप है. किशोर चौधरी के कहानी संग्रह ‘धूप के आइन में’ को यहां खरीदा जा सकता है. इस बीच एक मित्र आशीष चौधरी के पहले उपन्यास ‘कुल्फी एंड कैपेचीनो’ की प्रीबुकिंग शुरू हो गई है जिसे यहां आर्डर किया जा सकता है.]