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खुदाइयों के बाद घरों का इतिहास तो निकल आता है
पर टूटे हुए दिलों और खोए हुए रास्तों का नहीं.

विजय चौक की रेडलाइट की स्टापवाच के अनुसार वाहनों को अभी कुछ सेकंड और रुकना था. दायीं ओर के हरियाले पार्क में छाया सन्नाटा कहता है कि इंडिया गेट पर नाफिज कर्फ्यू को एक साल होने जा रहा है. रायसीना पहाडी की ओर से राष्ट्रपति भवन की मुंडेर झांक रही है और बोट क्लब के आस पास राजपथ के दोनों ओर हरियाली का राज है. बस में आगे से तीसरी सीट पर बैठी दो गुत (चोटी) वाली बच्ची ने अपना सीधा हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर बूंदों को छुआ और मुस्कारने लगी. कुछ और मुस्कुराहटें आसपास खिल गईं.

काती (कार्तिक) के शुरुआती दिनों में कहां बारिश होती है. इस बार हो रही है. बताते हैं कि दसियों साल में पहली बार ऐसा हुआ है. सावन, काती तक बरस रहा है. हमारी सावणी (खरीफ) फसलों की सोचता हूं तो लगता है कि जमीन की यह नमी अगली हाड़ी (रबी) तक चल जाएगी. जमीन की यही खूबी है, या तो सब जज्ब कर लेती है या सबकुछ उगाकर सामने ला देती है. वक्त की दीवारों पर टंगे साइनबोर्डों के न्यूज अलर्ट बताते हैं कि हमारा समाज व सरकारी तंत्र जमीन में गड़े सोने के लिए कस्सी फावड़े लेकर निकल गया है.

फ्लैश बैक में बाबा लोगों की सुनाई एक कहानी है. एक किसान के चारों बेटे नालायक निकले. किसान को हमेशा यह चिंता सताती रही कि उसके बाद बेटों का क्या होगा. अपने अंतिम समय में उसने बेटों को पास बुलाया और रहस्यमयी ढंग से उन्हें बताया कि दूर वाले खेत में बहुत सारा सोना दबा है उसे निकालकर वे अपना जीवनयापन आराम से कर लें. किसान चला गया तो बेटों को तुरंत सोने का ध्यान आया. कस्सी फावड़े लेकर पूरा खेत खोद डाला. एक सिरे से दूसरे सिरे तक. एक क्यारी से दूसरा बीघा… सोना तो क्या लोहे का एक टुकड़ा न मिला. बेटे बहुत निराश हुए और अपने दिवंगत पिता को खूब कोसा. इस सारे घटनाक्रम को देख रहे पड़ोसी किसान ने बेटों को सलाह दी कि उन्होंने इतनी मेहनत कर खेत की खुदाई कर दी तो क्यों न थोड़े बीज भी छिड़क दें ताकि कम से कम खाने लायक दाने तो हों. बताते हैं कि उस साल जोरदार बारिश हुई और देखते ही देखते खेत फसल से भर भर गया. तब पड़ोसी किसान के जरिए बेटों ने समझा कि उनके पिता ने किस सोने की बात कही ​थी.

हमारा समाज व सरकारी तंत्र अब तक यह नहीं समझ पाया है कि इस देश में जमीन से सोना निकालने का काम सदियों से किसान—मजूर करते आए हैं न कि एएसआई वाले. और इसके लिए जमीन को खोदना नहीं पड़ता उसकी जुताई—बुवाई करनी होती है, सोना तो खुद ब खुद उग आता है.

कहते हैं कि वक्त अपने हर नालायक बेटे के कमीज की बांयी जेब में अच्छी फसलों, बेहतरी की उम्मीदों के कुछ बीज डालता है. जरूरत तो इन बीजों को अगली बारिशों से पहले उस जमीन में छिड़कने भर की है जिसे वे किसी सोने की तलाश में खोद देते हैं.

[खुदाइयों के बाद कविता साभार, फोटो साभार मृदुल वैभव]