गांव: गांधी, नेहरू व अंबेडकर

डॉ अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांव छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरों में जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज  को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है... अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.
डॉ अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांव छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरों में जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है… अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

गांव हमारी आंखों में भर गया नास्‍टलजिया का पानी है, खुश्‍बू भरे खेतों से गुजरती यादों की पगडंडियां हैं. शहर संभावनाओं के वनवे हाइवे हैं. गांव में शाम को लौट आने के सारे विकल्‍प रहते हैं और शहर में लौटकर भी लगता है कि इस सफर में हैं. बीच का कोई विकल्‍प नहीं है. आने वाले दिन शहरों के हैं जहां लोग गांवों की याद में तड़पेंगे. यह महज संयोग नहीं कि बीते साल दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. तो शहर बरअक्‍स गांव की बहस फिर खड़ी हो गई है. आखिर गांवों में ऐसा क्‍या है जो हमें शहर नहीं दे पा रहे और गांव क्‍यूं शहरों से कदमताल नहीं कर पा रहे हैं?

 इतिहास पर निगाह डालें तो कार्ल मार्क्‍स ने भारतीय गांवों की कड़े शब्‍दों में आलोचना की थी. मार्क्‍स ने मानव विकास में नकारात्‍मक भूमिका के लिए ग्राम समुदायों की आलोचना करते हुए कहा कि ये सब जाति और किंकरता से दूषित हैं जहां मनुष्‍य को कूप मंडूक बना दिया जाता है. गांव के प्राकृतिक, सादगीपूर्ण, शुद्ध माहौल, जीवंत रिश्‍तों, स्‍पेस सब की बातें करने के साथ साथ हमें देखना होगा कि हमारे अपने नेताओं की इनके बारे में सोच क्‍या थी. वे क्‍या सोचते थे? यहां आधुनिक भारत की तीन बड़ी हस्तियों गांधी, नेहरू व अंबेडकर के गांव के बारे में सोच की चर्चा करना प्रासंगिक है. 

यह सही है कि अंबेडकर के अलावा इन दोनों बड़े नेताओं का गांव से वास्‍तविक नाता नहीं रहा. अंबेडकर का बचपन गांव में बीता और उन्‍हें वे सब दुश्‍वारियां झेलनी पड़ीं थीं जो लगभग अपने हर गांव में आम है. बाकी, तीनों ही विदेश में पढे और अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कहीं न कहीं बडे़ शहरों में की. शायद यही कारण है कि इन तीनों की गांवों के प्रति जो धारणा है वह प्रतिनिधि स्‍तर की नहीं कही जा सकती.

गांवों के सबसे बड़े पैरोकार महात्‍मा गांधी थे जिनका मानना था कि भारत गांवों में बसता है. उन्‍होंने ग्राम स्‍वराज की अवधारणा खड़ी की. महात्‍मा गांधी ने गांवों को वास्‍तविक या शुद्ध भारत करार दिया. इसके बरअक्‍स उन्‍होंने औपनिवेशक शासकों द्वारा बसाये जा रहे शहरों की आलोचना की. शहरों को उन्‍होंने पश्चिमी प्रभुत्‍व तथा औपनिवेशिक नियमों का गढ़ बताया. नेहरू ने जिस गांव का सपना देखा उसमें भू स्‍वामियों और भू स्‍वामित्‍व के लिए कोई जगह नहीं होनी थी. उन्‍होंने खेती बाड़ी से अधिक से अधिक लोगों को निकालकर उद्योग धंधों में लगाने की बात की. साथ ही वे हस्‍तशिल्‍प और कालीन उद्योग को नये सिरे से खड़े करने के पक्ष में थे.

गांव की जमीनी हकीकत से अधिक वाकिफ रहे डॉ (भीमराव) अंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्‍वराज की अवधारणा को कुछ ज्‍यादा ही भावुकतापूर्ण बताया और अपने अनुयायियों से गांवों को छोड़ने, शिक्षित बनने तथा शहरी केंद्रों की ओर जाने को कहा. अंबडेकर ने ग्राम स्‍वराज (विलेज रिपब्लिक) को भारत की बर्बादी तक करार दिया था. उन्‍होंने कहा, ‘गांव क्‍या है… अज्ञानता, संकीर्णता व सांप्रदायिकता के गढ़’ उनकी सोच थी कि ग्राम्‍य जीवन की राय अस्‍पर्शयता, उत्‍पीड़न से होकर ही निकलती है.

फिर भी ये तीनों नेता कुल मिलाकर मानते थे कि गांवों के मौजूदा हालात रहने लायक नहीं हैं और वहां बदलाव की गुंजाइश नहीं बल्कि महत्‍ती जरूरत है. गांधी चाहते थे कि बाहर के स्‍वयंसेवक गांवों में जायें और ग्राम स्‍वराज तथा ऐसी दूसरी अवधारणों को अमली जामा पहनाएं. नेहरू की राय में किसानों को खेती बाड़ी का अपना तरीका बदलना ही होगा. नेहरू चाहते थे कि हमारे गांव बदलें, आधुनिकी प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल गांव के सामाजिक व आर्थिक ढांचे को बदलने में हो. अंबेडकर कहते रहे कि दलितों का भविष्‍य कम से कम अज्ञानता के इन अड्डों में तो नहीं है. 

बीते साल यानी 2012 में दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. (राष्‍ट्रीय सांख्यिकी)
बीते साल यानी 2012 में दुनिया में सबस अधिक शहरी जनसंख्‍या के लिहाज से भारत दूसरे स्‍थान पर था और आने वाले दस 7-8 साल में यह उन देशों में शामिल होगा जहां शहरी जनसंख्‍या सबसे तेजी से बढेगी. (राष्‍ट्रीय सांख्यिकी)

तो ग्राम्‍य समाज में स्थिरता तथा सतत सामाजिक सुरक्षा महत्‍वपूर्ण रहा और प्रगति के लिए कोई जगह नहीं थी. वह मायने ही नहीं रखती थी. लेखक, कार्यकर्ता अरूंधति राय ने एक साक्षात्‍कार में कहा कि भारत अपने गांवों में अब नहीं बसता, वह शहरों में बसता है. भारत गांवों में मरता है-अपमानित होता है. इसी दुनिया के प्रमुख शहर लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने गांधी के गांव के प्रति मोह को खारिज करते हुए हाल ही में कहा कि 1948 में जब गांधी ने यह कहा कि भारत का भविष्‍य गांवों में है तो वे गलत थे. जॉनसन के अनुसार, ‘ यह अनरोमांटिक लेकिन सच है कि दुनिया का भविष्‍य शहरों में है. हां गांधी की यह बात स‍ही थी कि लोग गांव की याद में तड़पेंगे.’ इतिहास से इतर इस दौर का सबसे बड़ा संकट यह है हम पगडंडी और हाइवे तथा गांव व शहर के बीच का कोई रास्‍ता नहीं निकाल पाये हैं.


(कुरजां में प्रकाशित आलेख से साभार)