आसमान से कुछ यूं दिखते हैं बादल के खेत.
आसमान से कुछ यूं दिखते हैं बादल के खेत.

टैक्‍सी, विमान, रेल, कार, बस व बाइक… कई साधनों पर कुल मिलाकर ढाई हजार किलोमीटर से ज्‍यादा का सफ़र दो तीन दिन में पूरा कर थार के उस सिरे पर आ पहुंचा हूं जहां एक देश की सीमा बाहें समेट रही है तो दूसरे देश का बार्डर शुरू होता है. कनार्टक की पंचगिरि पहाडियों से अपने राजस्‍थान यानी थार तक की बालू की इस यात्रा में तापमान से लेकर जीवन जीने के ढंग और मुआवरे सब बदल चुके हैं.

जेठ आषाढ में अपने देस नहीं आने की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां हूं तो शायद इसी कारण कि अपनी नाड़ इसी में कहीं दबी है. कि जेठ का आखिरी और आषाढ का पहला दिन थार में बीता है. सुबह धूल भरी आंधियां लपेटे आती हैं तो दुपहरियों में लू के तीखे थपेड़े हैं. शामें तो नहीं हां, उतरती रातों के पास राहत के कुछ खेस दरी जरूर होते हैं.

तो, खेतों के लिहाज से सुस्‍ताता समाज नये मकान बनाने में लगा है. पक्‍के मकान. अपने दस में से सात परिवार वाले नये मकान बना रहे हैं. हर कहीं काम चल रहा है. तोड़ फोड़ या निर्माण की गूंज सुनाई देती है. जो खाली हैं उन्‍होंने भी प्‍लाट ले लिए हैं. किसने, कहां प्‍लाट लिया या बेचा तथा कौन नया मकान बना रहा है, हर ओर यही बात है. टूटते घरों में इस तरह से मकान बनते हुए देखता हूं तो अपने घर की दो साल पहले गिर चुकी दीवार भी याद आ जाती है.

इस नये निर्माण की नींव की कुछ ईंटें एक नयी फसल ग्‍वार से भी आई हैं. जो इलाका कुछ साल पहले अकाल की मार झेल रहा था वह अचानक ही इतना खर्च करने वाला हो गया तो इस फसल के कारण भी. नरमे कपास तथा किसी भी अन्‍य नकदी फसल की तुलना में कम लागत, मेहनत से तैयार होने वाली ग्‍वार की फसल तुरता लाभ देती है. भाव भी ठीक ठाक हैं. सारे समीकरणों का निचोड़ यही कि अगर किसान को उसकी फसल की सही कीमत मिले तो वह खुदमुख्‍तयार हो सकता है. नरेगा पर अरबों खरबों के खर्च को जायज बताने वाले नौकरशाहों और भाड़े के कलमकारों को इस तथ्‍य पर गौर करना चाहिए. वे सोचें की नरेगा अच्‍छे उद्देश्‍य के साथ शुरू की गई गलत योजना कैसे साबित हो गई? अपने भाई बंदों ने इसे और भी गलत ढंग से लिया.. मुफ्त के पैसे की योजना के रूप में. मेहनत की कमाई की बरकत को समझने वाले देश समाज में इस योजना के मनोवैज्ञानिक दुष्‍प्रभावों को समझना होगा. किसान और खेती बाड़ी का भला सही मेहनताने और सही कीमत से ही हो सकता है. इस लिहाज से अपना वोट नरेगा के खिलाफ है. इसने एक तरह से खेती बाड़ी को नुकसान पहुंचाया है.

खैर, अपने ही शहर के जिस अच्‍छे खासे गेस्‍ट रूप में ठहरना पड़ा उसकी रिसेप्‍शन के पास बड़ा सा एक्‍वेरियम रखा है. रंग बिरंगी मछलियों वाला. जब भी एक्‍वेरियम को देखता हूं तो यही सवाल उठता है कि ये खाती अघाती मछलियां भी कभी बड़ी होती हैं क्‍या? इतनी बड़ी कि दुनिया का कोई भी एक्‍वेरियम उनके लिए छोटा पड़ जाये और उन्‍हें समंदरों में छोड़ने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं बचे. थार के इस सिरे में समंदर की परियों को इन सजावटी एक्‍वेरियम में देखता हूं तो अंदर से कुछ घुटता है. लेकिन कुछ कहता नहीं क्‍योंकि यह गेस्‍ट अपने दोस्‍त का है और अपने कई यार आजकल एक्‍वेरियम जैसा कमाऊ धंधा करते हैं!