kankad201304

ब्राडगेज पटरियों के साथ चलकर आने वाले संदेशों में लोहे की गंध इस कदर हावी थी कि सिग्‍नल की बत्तियां हरा होने से मुकर गईं. सुबह ड्यूटी पर निकले लाइनमैन को संदेशों के कुछ टुकड़े छोटे पत्‍थरों, कुछ पास की कीकरों पर अटके दिखे. उसके हथौड़े से शब्‍दों का कोई मेल नहीं था इसलिए वह फिश प्‍लेटों को ठकठका कर आगे बढ़ गया. बताते हैं कि दूसरों के सफर से उकताए स्‍टेशन एक दिन आंदोलन पर चले गए और ट्रेनों ने इस मांग के साथ हड़ताल कर दी कि उन्‍हें बदलाव के तौर पर कुछ दिन समंदर में चलाया जाये.

उन्‍हीं दिनों पता नहीं कैसे पटरियों की सड़कों से दोस्‍ती हो गई. सड़कों ने उन्‍हें बताया कि बिना वजह कहां और कब कब टूट बिखर जाना है. तारों से उतरकर बिजली पटरियों में दौड़ने लगी और डिब्‍बे इंजिन को लेकर भाग गए. टिकटें सिस्‍टम को बुक कर रहीं थीं कि मौसमों का कोई यात्री वेटिंग लिस्‍ट में ना आये. खैर बात आई गई होती गर ड्राइवर शांत रहते. वक्‍त के ड्राइवरों की यूनियन ने सरकार के सामने मांग रखी कि वे ट्रेनें चलाते चलाते थक गए हैं इसलिए उन्‍हें कुछ दिन देश चलाने का मौका दिया जाए. उधर देश था कि वह अपने देश होने के गर्व में ही फूला जा रहा था और सरकार उसे चला चला कर कुप्‍पा हुई जा रही थी.

तो जो पहिए थे वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि वे ट्रेन को ढो रहे हैं या कि ट्रेन उन्‍हें. पुलों का अलग मसला था. वे चाहते थे कि उनके नीचे बहने वाले नदी नालों को रोक दिया जाए और उन्‍हें बहने दिया जाए. यानी वे चलें, नदियां रुकें. नदियों का जो पानी था उसने इतने साल पुलों के नीचे बहने का मुआवजा मांगा और कहा कि उसे डबल डेकर के फर्स्‍ट एसी में देशाटन कराया जाए. पानी की इस मांग पर पटरियों के आसपास के पेड़ इतने खुश हुए कि वे क्रांति क्रांति के नारे लगाते हुए ट्रेनों के साथ दौड़ने लगे. (गोया वे आज भी दौड़ते हैं.)

किरदारों के इस अकबकाये व्‍यवहार से कहानी क्‍या मोड़ लेगी यह सोचता हुआ बालकनी के फट्टे पर बैठा हूं. चढ़ता हुआ वैशाख है. थोड़ी देर पहले की बूंदाबांदी के बाद छितराए बादल वैसे ही चमक रहे हैं जैसे इन दिनों थार के धोरे चमकते हैं. चम चम चमके चांदनी ज्‍यूं चांदी के खेत. आसमान का कारिंदा थार के एक्‍सरे को चांदनी में देख रहा है. गेहूं की गमक से लहराते खेतों के दिन हैं. खेतीबाड़ी के लिहाज से सबसे हसीन रातों की रुत जब उत्‍तर भारत का प्रमुख अनाज कणक (गेहूं) समेटा जा रहा है.

खैर बात इतनी सी है कि उल्‍टबांसियां हमेशा अपवाद रहती हैं. वे जीवन का नियम नहीं बन पाती हैं. अमृता ने कहीं लिखा था-
कि दुनिया की हर बगावत एक ताप की तरह चढती है,
ताप चढ़ते हैं और उतर जाते हैं.