चंदा मामा की वाईफ जिम जाती है और बच्‍चे स्‍कूल ? उसने पूछा था. हम अपनी पसंदीदा जगह बालकनी की सीढियों पर बैठे थे. उसके चंदा मामा सामने से चले आ रहे थे. उनका रास्‍ता कुल मिलाकर वही है जो सुबह सुबह सूरज बाबा का होता था. हवा में फगुनहट तारी है और उसने हमेशा की तरह अपना सवाल चुपके से मेरे हाथ पर रखा कि क्‍या चंदा मामा की वाईफ जिम जाती है? और कि क्‍या उनके बच्‍चे स्‍कूल जाते हैं? कोई जवाब नहीं था. अंदर वह जिस डोरेमोन को देखते हुए आई है उसके पास हर समस्‍या का समाधान करने वाला गैजेट है जिसे वह नोबीता से लेकर जियान तक सभी को देता रहता है. अलादीन की चिराग की तरह. अपन ने भी धीरे से मुस्‍कुरा कर कहा अपने डोरेमोन से पूछ लेना. उसने अपने इस्‍टाइल से ‘हूं’ कहा और सीढियां उतर कर अंदर चली गई.

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अपने यहां हाल तक टीवी नहीं था. जब वह दो ढाई साल की हुई तो खरीदा कि इस बड़े शहर के अपने छोटे से मकान में उसका मन लगा रहे. उसके साथ बीते डेढ दो साल में जी भर  टीवी देखा. तभी यह ज्ञान प्राप्ति हुई कि हमारे यहां बच्‍चों के नाम पर जो चैनल चल रहे हैं वे भयंकर ढंग से अनुवादित और नीरस हैं. नोबिता से लेकर शिनचेन, डोरेमेन से लेकर कराती जैसे जापानी कैरेक्‍टर हों या डरावने और मारधाड़ से भरे अमेरिकी चरित्र. बार्बी और सिंड्रेला के नाम पर पता नहीं किस दुनिया के भयभीत कर देने वाले षड्यंत्र दिखाये जाते हैं. इसी तरह एक सीरियल में भारतीय अभिनेता अभिनेत्रियों के आवाज की भयानक मिमिक्री करते चरित्र हैं. कोई भी अपने भारतीय परिवेश से मेल नहीं खाता. भीम, छुटकी और कालिया कहीं मुकाबले में नहीं!

निसंदेह हम बच्‍चों के लिए चड्ढी पहन के इक फूल दशकों पहले खिला था. अनुवाद और एडाप्‍टेशन का अद्भुत अंतिम उदाहरण. उसके बाद बच्‍चों के सीरियल के नाम पर कचरा परोसने की लंबी फेहरिस्‍तें हैं. यह सोचकर इस दौर के बच्‍चों पर दया आती है.

इधर खोजबीन की तो पता चला कि बच्‍चों में दुनिया के लिहाज से पांच श्रेष्‍ठ चैनलों में से तीन हमारे यहां नहीं आते हैं. एक कार्टून नेटवर्क है जिस पर सबसे बढिया कार्यक्रम शायद टाम एंड जैरी है. आज भी बच्‍चों को गुदगुदाने वाला सबसे बढिया कार्यक्रम जिसे बच्‍चों के साथ साथ आप हम भी इंज्‍वाय कर सकते हैं. पूरे घर के लोग. अपन बीबीसी के सीबीज़ को भी इसी श्रेणी का अच्‍छा चैनल मानते हैं जिसमें बच्‍चों की क्रि‍एटिविटी और जिज्ञासा को बनाये और बढाये रखने के कई कार्यक्रम आते हैं. लेकिन यह चैनल अपने ज्‍यादातर घरों तक नहीं पहुंचता.

यह हैरान करने वाली बात है कि बच्‍चों के लिए अधिकांश सबसे बढिया एनिमेशन फिल्‍में जापान या अमेरिका में बनी हैं. अमेरिकी आइस एज या वाल ई तो निसंदेह काबिले तारीफ है लेकिन अपन को जापानी माय नेबर टोटोरो इन सब पर भारी लगती है. इसके निर्माता मिया‍जाकि ने बाद में पोरको रोसो तथा पोनयो जैसी अद्भुत ए‍नीमेशन फिल्‍में भी बनाईं. इसके बाद रियो आती है. और हमारे यहां टूनपुर का सुपर हीरो, हनुमान या अर्जुन और दिल्‍ली सफारी जैसी कुल जमा फिल्‍में बनी हैं. दिल्‍ली सफारी इन सबमें अच्‍छा प्रयास है.

यह हैरान ही नहीं दुखी करने वाली बात है कि अपने भविष्‍य, अपने बच्‍चों के मनोरंजन व ज्ञान के प्रति हम इतने लापरवाह हैं कि इस काम को उन कंपनियों के भरोसे छोड़ दिया है जिनका एक मात्र काम अनुवादित या ऐसे ही कार्यक्रमों के जरिए अपना काम धंधा चलाये रखना है. यानी मान लिया गया है कि बच्‍चों को अच्‍छे कार्यक्रम दिखाने भर की जिम्‍मेदारी माता पिता की है चैनल और कार्यक्रम बनाने वालों का इससे कोई लेना देना नहीं. यहां अमेरिकी लेखक संपादक ग्रेग इस्‍टरब्रुक की बात याद आती है. इस्‍टरब्रुक के अनुसार जब टेलीविजन निर्माता यह कहते हैं कि बच्‍चों को टेलीविजन से बचाने की जिम्‍मेदारी उनके माता पिता की है तो वे खुद के लिए ही यह चेतावनी जारी कर रहे होते हैं कि उनके उत्‍पाद खाने लायक नहीं हैं.

इधर जब बच्‍चों के चैनल पर एडल्‍ट सीरियलों के एड या सेमी एडल्‍ट एड आते हैं तो अपने फिर डोरेमोन का ही मुंह ताकते हैं कि क्‍या इन चैनलों के इलाज का कोई गैजेट उसके पास नहीं है. शुक्र है, टोरेंट और यूट्यूब जैसे नेटवर्क का जिनकी बदौलत अच्‍छी फिल्‍में डाउनलोड कर हम अपने बच्‍चों को दिखा पा रहे हैं. 

(picture curtsy My Neighbor Totoro)