Shoda Koho, Moonlit Sea, c. 1920साल के आखिरी दिनों में होना तो मेड़ता में था. मीरां बाई के मेड़ता में. सोते जागते कई बार इस कस्‍बे से गुजरे लेकिन कभी ठहरना नहीं हुआ. इस बार ठहरने के लिए जाना था. पर दिल्‍ली के हद दर्जे तक व्‍यथित कर देने वाले माहौल में नहीं जा पाये. कुछ घटनाएं हमारे अस्तित्‍व, हमारे होने के विश्‍वास को हिला देती हैं और अचानक लगता है कि कुहरा बाहर से ज्‍यादा भीतर भर गया है. न कुछ दिखाई दे रहा है न सूझ रहा है. यह भीतरी अंधेरा अधिक खतरनाक होता है.

ऐसे ही कुहरे भरे दिनों में पता चला कि ‘अभिनव राजस्‍थान’ मेड़ता में सम्‍मेलन कर रहा है. अशोक चौधरी, भारतीय प्रशासनिक सेवा (सिविल सर्विसेज) छोड़कर आये और यह अभियान शुरू किया. उनका मानना है कि सरकारी योजनाओं का सही सही लाभ आम लोगों को मिले तो हालात बदल सकते हैं.

यानी सिस्‍टम में अगर कमी है तो उसे दूर किया जा सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि जिनको लाभ मिलना है उन्‍हें योजनाओं की जानकारी रहे. लोग अपने हक के लिए जागरूक रहें. वे सरकारी योजनाओं के कार्यान्‍वयन पर निगरानी रखें और किसी भी कमी के खिलाफ आवाज उठाएं. अपन जो समझे हैं, उनकी लड़ाई सिस्‍टम के खिलाफ नहीं उसे बेहतर बनाने, उसका अधिकतम फायदा लेने के समर्थन में है. शासन प्रणाली जिसे फैशन में सिस्‍टम कहते हैं, उसे लेकर निराश होने वाले दिनों में अशोक भाई और अभिनव राजस्‍थान जैसे प्रयास अपने पैरों के नीचे खिसकी हौसले की जमीन को यूं नहीं थाम लेते हैं. वैचारिक तौर पर लाख विभेद हों, लेकिन इस पर तो एक राय ही है कि हमें खुद पर, अपने सिस्‍टम पर भरोसा रखना होगा. बेहतर कल की उम्‍मीद और उसके लिए प्रयास करने का हौसला रखना होगा. 

किसी सयाने ने कहा है कि धीरे धीरे हमें चीजों की आदत हो जाती है. हम युद्ध जैसी चीजों के भी आदी हो जाते हैं. पाश के लिए यही स्थिति सबसे खतरनाक होती है. बीते साल दिल्‍ली और देश में जो हुआ वह इस जकड़न के टूटने का संकेत है. एक समाज जिसे सदियों से बहन बेटियों के खिलाफ होने बदतमीजी की आदत हो गई थी वह उसके आवाज उठा रहा है तो इसके गहरे माने हैं. सबसे बड़ी बात कि यह आवाज उस पीढी से आ रही है जिसे हम एक्‍स या वाई जेनरेशन कहते  हैं. यानी बात दूर तलक जाएगी इसकी उम्‍मीद की जा सकती है.  

राजस्‍थानी की एक बहुत चर्चित कविता की शुरुआत है ‘तू बोल तो सरी जबान खोल तो सरी’ (तू बोल तो सही, जुबां खोल तो सही). एक समाज जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी हवेलियों को बहुओं की ऊंची आवाज और बच्चियों की किलकारियां सुनना अच्‍छा नहीं लगता, वहां लगभग साढे चार सौ साल पहले मीरां बाई तमाम वर्जनाओं के खिलाफ खड़ी ही नहीं हुई, ताउम्र रूढियों से लोहा लिया. आवाज तो उठानी ही होगी.  और अगर कहीं से आवाज उठती है तो उसको थाम लेना होगा. 

निराशा के ऐसे दिनों में मुझे नादेश्‍दा मेंडलस्‍टेम (nadezhda mandelstam) भी याद आती है. स्‍टालिन की सत्‍ता खिलाफ कविताएं रचने वाले अपने पति के साथ निर्वासन भोगती, गिरफ्तारी से बचने के लिए गांव दर गांव घूमती नादेश्‍दा. नादेश्‍दा ने स्‍टालिन के शासन में लगभग बीस साल निर्वासन भोगा. आजीविका के लिए दिहाड़ी पर पढाने का काम किया. गिरफ्तारी के दौरान पति की मौत के बाद उनकी लेखकीय विरासत को संजोये रखने के संकल्‍प के साथ एक बर्फीली धरती पर संघर्ष करती रही और पहली किताब उम्‍मीदों के खिलाफ उम्‍मीद या होप अगेंस्‍ट होप (Hope Against Hope) छपवाई.

हमारे आसपास की, नाउम्‍मीदी और निराशा की काली दीवारों पर नादेश्‍दा जैसे कई नाम लटृ्टू से यूं ही नहीं चमकते रहते. नादेश्‍दा का रूसी अर्थ होप याने उम्‍मीद होता है. और उम्‍मीद इक जिंदा शब्‍द है.

(painting shoda koho, Moonlit Sea, c. 1920, curtsy net)