सामने बन रही बिल्डिंग से उसकी शिकायत यही है कि उसने हमारी हवा रोक ली और गर वह ‘छोटे भीम’ जितनी स्‍ट्रांग हुई तो इनको स‍बक सिखाएगी. वह आजकल जब भी बालकनी में मेरे साथ बैठती है तो यह मुद्दा उठ ही जाता है. फिर वह अपने छोटे हाथों और बड़ी आंखों से समझाने की कोशिश करती है कि बादल कैसे बनते हैं और कैसे बारिश होती है. थोड़ी देर खामोश हो जाती है और कहती है अबकी बार अच्‍छी बारिश नहीं हो रही ना, पहली (पिछली) बार तो हम खूब नहाए थे. टप टप टप.. वह अपनी रौ में बारिश की कहानियां बताने लगती हैं.

ये बिल्‍डरों के दिन हैं. बारिशों के नहीं!  इन दिनों ने हमें न तो जमीन पर रहने दिया है और न जमीन का ही.  

इस साल सामान्‍य से कम बारिश के आंकडे़ अखबारों में है. रुखे सूखे सावन के बाद भादों की उमस में ये आंकड़े टीसते हैं. आंकड़े, हालात का एक पहलू भी ढंग से बयान नहीं करते. इनमें यह तो बताया जाता है कि अबके सामान्‍य मेह नहीं हुआ. बारिश कम हुई है लेकिन कितनी हुई, इसका न तो कोई जवाब है, न सवाल ही उठाया जाता है! बारिश हुई नहीं के तथ्‍य को सामान्‍य से थोड़ी कम बारिश के कुतर्क तक लाने में जो खपाई जा रही ऊर्जा हैरान परेशान करती है.

भ्रम इस कदर रचा गया है कि बारिश को अंगुलियों से नापने वाला गांव ही सकपकाया सा है. डगमगाते भरोसे के साथ्‍ा वह कभी अपने सूखे खेतों तो कभी अंगुलियों को देखता है. उसकी अंगुलियां उस कम मेह को नाप क्‍यूं नहीं सकीं जो खबरों में है. गांव का सूखा, शहर की खबरों में गीला होकर पानी के रूप में कैसे बहने लगता है इसे इन दिनों देखा जा सकता है. पढा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है.

अपने गांव में अगर कुल मिलाकर 50-60 अंगुल मेह हो जाए तो जमाना माना जाता है. इस साल दस अंगुल भी मेह नहीं हुआ. नरमे कपास से लहलहाने वाले खेतों में रुखा सूखा ग्‍वार उंघ रहा है. नीरे चारे का संकट उगने लगा है. अगर मौजूदा हालात सामान्‍य से कम बारिश के हैं तो आंकड़े देने वाले भाई लोग सूखे और अकाल को क्‍या कहेंगे, कैसे बताएंगे?

अकाल में सुकाल के संकेत बांचने और बताने के इन दिनों, रातों में आंकड़ों का घनघोर अंधेरा है. हर सुबह खबरों में बारिशें पढ़ता हूं और भीगता हूं.

(pic curtsy net, with due respect)