कभी धन धान्‍य से भरपूर राजस्‍थान का एक इलाका आज ईंट भट्टों के लिए जाना जाने लगा है. यहां ईंट भट्टों की बढती संख्‍या एक बड़े संकट की आशंका पैदा करती है तो इसके सामाजिक, आर्थिक तथा पारिस्थि‍तकीय पहलुओं पर भी गौर करने की जरूरत है.

जहां अब ईंटों की खेती होती है!

दसेक साल पहले तक हम खुद को ऐसे क्षेत्र का होने पर गर्व करते थे जो थार में सबसे अधिक ऊपजाऊ और हरा भरा इलाका है. आज वही इलाका ईंट भट्टों के लिए जाना जाने लगा और जिस हवा में कभी धान, सरसों, गेहूं की महक हुआ करती थी उसमें धुएं की खारिश रहती है. जहां कभी खलिहानों में फसलों के ढेर दिखते थे वहां अब नजर आते हैं काली पीली ईंटों के ढेर…

आने वाली पीढियां, ये धरती और ये आसमां.. हमें शायद ही माफ करे

यह इलाका है राजस्‍थान के दो सबसे आधुनिक जिलों, गंगानगर व हनुमानगढ़ का जिसने बरसों बरस तक थार की एक बड़ी आबादी का धान, गेहूं, चने व बाजरे से पेट भरा. जो देश की कपास पट्टी में शामिल है और जिसे तीन तीन सिंचाई परियोजनाओं और मानवीय इतिहास की एक सबसे प्राचीन नदी ने सींचा है. उस इलाके की आंखों में आज ईंट भट्टों की चिमनियों से निकला धुंआ भर गया है. यहां लहलहाती फसलों की जगह ईंट भट्टों के जंगल उग आये हैं.

क्षेत्र के पारिस्थितकीय तंत्र पर मंडराता खतरा, दिन ब दिन लालची होते धरतीपुत्रों के ह्रदय को विचलित नहीं करता है, हर महीने कुछ और नयी चिमनियां जमीन के सीने पर पैर रख खड़ी हो जाती हैं. लोगों या किसानों की की सोच समझ में आया यह बदलाव डरावना है. अजीब सी बात है कि बीते दस साल में ईंट भट्टों की संख्‍या इतनी तेजी से बढी और किसी ने आवाज नहीं उठाई, क्‍योंकि जो भाई लोग वैश्‍वीकरण तथा गेट्स के खिलाफ नारे लगाते हुए बडे हुए थे वे खुद भट्टों के मालिक हो गए हैं. जमीन को मां मानने वाले किसान ने खुद ही अपने खेतों के ऊपजाऊपन को ईंटे पकाने में झोंक दिया है.

इस क्षेत्र में ईंट भट्टों की बढ़ती संख्‍या का यह मामला केवल पारिस्थितकीय या समाज शास्‍त्रीय विचार का नहीं है इसके दूसरे पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए. बीते कुछ वर्षों के अकाल के बाद किसानों का रुझान इस तरफ हुआ था. और धीरे धीरे यह स्‍टेट्स सिंबल बन गया. यहां सरकारी अनुदान का भी पेंच है और सरकारी स्‍तर पर किसी न किसी लापरवाही को भी इसमें सूंघा जा सकता है. भट्टों की संख्‍या बढने के साथ ईंटों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं जो हैरान करती है. इस मामले में साहित्यिक स्‍तर पर चुप्‍पी है तो पत्रकार साथी पता नहीं किस बाजार की पड़ बांचने में लगे हैं. प्रशासन में गये दोस्‍त एलियंस की श्रेणी में हैं जिनका इस दुनिया जहान से वास्‍ता नहीं है. सारे हालात व्‍यापक शोध का विषय हैं.

बीते दस साल में इन दो जिलों में ईंट भट्टों की संख्‍या में यह वृद्धि हर लिहाज से चिंताजनक है. संभव: एक मानसिकता और पारिस्थितकीय स्‍तर पर एक बड़े संकट का संकेत है, जिस पर गौर किया जाना चाहिए.

(कांकड़ के कुछ साथी इस पर काम कर रहें. उनके शोध और रपटों का सार शीघ्र ही.)