मावठ की बूंदें बालकनी से अंदर आती हैं और बारिश शब्‍द हवा में तैर जाता है. ढाई साल की उर्वी तो बारिश शब्‍द सुनते ही बूंदों सी नाचने लगती है. बारिश देखेंगे… क्‍लेपिंग क्‍लेपिंग. सर्दी धीरे धीरे जीवन में उतर रही है छोटे होते दिनों और लंबी रातों के सा‍थ. सर्दी, ऐसा मौसम जब रजाई जिंदगी में प्रेमिका से भी ज्‍यादा करीब हो जाती है और यादों के शाल, स्‍वेटर, मफलर जिस्‍म पर बीवी सा अधिकार जमा लेते हैं. कभी मुस्‍कराती, डराती, कभी रूलाती यादें. यादों में न तो पहाड़, फूलों से ज्‍यादा भारी होते हैं न फूलों का वजन पहाड़ों से कम. ऐसी मावठ यादों में लंबे- लंबे गन्‍ने वाले खेतों को ले आती है या सरसों की मेड़ों को, जिनकी गीली माटी में आज भी कुछ निशां बाकी हैं. कुछ वादे गेहूं के खेतों में निराई गुड़ाई करते नज़र हैं तो कई सपने अलाव सा जलते. मावठ अनेक ऐसी यादों की फसल को उगा देती है हर साल.

तो हाड़ी की फसल के लिए वरदान कही जाने वाली सर्दी की यह पहली बारिश यानी मावठ हो रही है. घर से काचर आए हैं. चटनी तो बनेगी ही. कुंडी में साबुत लाल मिर्च के साथ रगड़ कर बनाएंगे. रही भाभी के हाथों की खुश्‍बू वाले चूंटिए (कच्‍चे घी) की बात तो घर से आया घी है ना. उमेश कह रहा है कि दिल्‍ली का मौसम बड़ा ‘सेक्‍सी’ हो गया है. … (जारी)