जयपुर का बोधि प्रकाशन कोई बड़ा संस्‍थान नहीं है. लेकिन 100 रुपये में दस किताबें देने की उसकी योजना ‘बोधि पुस्‍तक पर्व’ इन दिनों पाठक, प्रकाशन और आलोचना जगत में काफी चर्चा में है. फेसबुक पर रामकुमार सिंह इस योजना में रायल्‍टी के सवाल पर बड़ी बहस कर चुके हैं. इसे पुस्‍तक जगत की नैनो क्रांति बताया है. इस योजना को आर्थिक व्‍यावहार्यता और रायल्‍टी जैसे सवालों के बीहड़ से निकलने के बाद सामग्री की गुणवत्‍ता के प्रश्‍न के तपते रेगिस्‍तान को लांघना होगा. वैसे बोधि प्रकाशन के मालिक कवि मायामृग अपने इस अनूठे विचार के परिणाम को लेकर काफी आश्‍वस्‍त हैं और इसकी खुशी को उनके चेहरे की लकीरों में देखा जा सकता है. पहले सैट में जिन लेखकों को शामिल किया गया है उनमें चंद्रकांत देवताले, विजेंद्र, नंद चतुर्वेदी, महीप सिंह, नासिरा शर्मा, हेमंत शेष, हेतु भारद्वाज, सत्‍यनारायण, प्रमोद कुमार शर्मा तथा सुरेंद्र सुंदरम हैं. मायामृग से पहली बार मिलना तो पहला सवाल ‘बोधि पुस्‍तक पर्व’ योजना की व्‍यावहार्यता को लेकर था. इसमें कोई संदेह नहीं कि जयपुर का यह युवा और अब तक ‘अननोटिस्‍ड’ प्रकाशक 15 साल के अपने प्रकाशक करियर में बदलाव के मोड़ पर है. टुरते फिरते उनसे बात की गई-

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प्रकाशक के रूप में यह कदम दुधारी तलवार पर चलने जैसा है. एक तरफ घर फूंक कर तमाशा देखने की नौबत तो दूसरी तरफ रायल्‍टी को लेकर आलोचकों का निशाना. लेकिन सैट के प्रति पाठकों व प्रकाशन जगत का शुरुआती रूझान बताता है वे एक पक्ष को साध गए हैं. रही बात रायल्‍टी, सामग्री की गुणवत्‍ता आदि की तो इस पर अभी चर्चा होनी है. अगर यह योजना सफल रहती है तो इसके दूरगामी परिणामों से इनकार नहीं किया जा सकता, न केवल मेरे लिए बल्कि प्रकाशन जगत के लिए भी.

आर्थिक रूप से व्‍यावहार्यता : आर्थिक रूप से व्‍यावहारिकता का सोच कर यह योजना शुरू नहीं की गई. लेखक और पाठक के रूप में सपना था जिसे पूरा करने की कवायद है यह योजना. लेकिन जिस तरह से पाठकों का समर्थन मिला है उसे देखकर लगता है यह आर्थिक व्‍यावहार्यता के मानकों पर भी खरी उतर जाएगी. सैट के लोकार्पण के पहले से हफ्ते में ही लगभग 925 सैट बिक गए. दूसरे संस्‍करण की बात भी शुरू हो गई है. सैट को गिफ्ट पैक में पेश करने का भी विचार है. हर साल इस तरह के दो सैट पेश किए जाएंगे यानी 20 लेखकों की किताबें.

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क्‍या गणित है : गणित और हिसाब किताब बणिया बुद्धि वाला मामला है. इस योजना में बुद्धि नहीं लगाई गई दिल से काम किया गया. लीक से हटकर काम करने का मन था जो किया गया है. आप पारं‍परिक प्रकाशक के रूप में सौ रुपये में दस किताबें बेचने की तो नहीं ही सोच सकते. निसंदेह रूप से घर फूंककर तमाशा देखने की स्थिति में भी मैं नहीं हूं. लेकिन कुछ बातें हैं जो इस योजना के पक्ष में है जैसे कि टाइपसेटिंग, डिजाइनिंग से लेकर प्रकाशन तक की सारी व्‍यवस्‍था मेरी अपनी है. इस लिहाज से लागत कई बार काफी कम हो जाती है. निसंदेह रूप से अगर यह योजना सफल होती है तो इसके इतर फायदे भी हमें मिलेंगे.

गुणवत्‍ता का पंछी : पहले सैट में आई दस किताबों की सामग्री और उनकी गुणवत्‍ता पर बहस तो अब शुरू होगी. अभी तक तो लोग इस योजना को लेकर ही आश्‍वस्‍त नहीं हो पा रहे हैं. जैसे जैसे किताब पाठकों तक पहुंच रही है, गुणवत्‍ता का पंछी उड़ने लगेगा. हमने अपनी तरफ से कोई समझौता नहीं किया है. बाकी समीक्षा, आलोचना तो अभी होनी है.

रायल्‍टी का पेंच : रायल्‍टी का सवाल गलत संदर्भ में उठाया गया अच्‍छा सवाल है. जब आप रायल्‍टी की बात करते हैं तो शर्त और नियमें भी तय होती हैं. दस रुपये मूल्‍य की किताब पर आप कितनी रायल्‍टी की उम्‍मीद करते हैं. हम पैसे लेकर किताब नहीं छाप रहे हैं. लेखकों ने रायल्‍टी नहीं लेने का अनुबंध किया है. हां अगर किताब की कीमत बढाते हैं तो उन्‍हें रायल्‍टी भी दी जाएगी. राजस्‍थान क्‍या पूरे भारत में लेखकों, प्रकाशकों की हालत किसी से छुपी नहीं है. पैसे लेकर किताबें कहां नहीं छापी जाती. बड़े बड़े प्रकाशक ऐसा करते हैं.

पता- बोधि प्रकाशन, तरू ऑफसेट एफ -77 सेक्‍टर 9, रोड न 11

करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया बाइस गोदाम जयपुर 302066 फोन. 0141-2503989, 9829018087

अगर एक लाख रुपये में नैनो कार उपलब्‍ध कराना एक क्रांति मानी जा सकती है तो उससे बड़ी व सार्थक क्रांति हिंदी क्षेत्र में यह (बोधि पुस्‍तक पर्व योजना) है. हालांकि यह क्रांति सिर्फ हिंदी साहित्‍य संसार में हुई है इसलिए इसकी खबर शायद हिंदी के अखबार लेना जरूरी नहीं समझें.   – विष्‍णु नागर, एक समीक्षा में.

असल में क्रांति पाठक को सस्‍ती किताबें से नहीं होती। वो तो जमीन पर ही होती है। अपने दौर के महान लेखकों ने अपने समय में क्रांतियों में सक्रिय हिस्‍सेदारी ली। हम सौभाग्‍यशाली हैं कि लोकतंत्र में हैं। हम बयान तो दे सकते हैं। अखबार नहीं छापते हैं तो क्‍या हुआ। फेसबुक पर ही दें। छोटी सी आवाज भी अहमियत रखती है। – रामकुमार सिंह, रायल्‍टी के सवाल को उठाते हुए.