निर्मल वर्मा ने कहीं लिखा था कि हम जिस सदी में जीते हैं, हम में से हर व्‍यक्ति उसका गवाह है और गवाह होने के नाते जवाबदेह भी. सार्त्र के शब्‍दों में तो जीने का मतलब ही जवाबदेही है. दो घटनाएं हैं- मिर्चपुर में दलित लड़की को जिंदा जलाने की और कोडरमा में युवा पत्रकार  नीरू की मौत की.  आरोप है कि विजातीय प्रेम संबंधों के चलते नीरू को उसके परिजनों ने ही मार दिया. यह इन दो लड़कियों की मौत या हत्‍या की बात नहीं है, बात हमारे दिमाग और समाज में पसरे अंधेरे की है. इन घटनाओं ने हमारे समाज, सामाजिक ढांचे और ‘हमारे’ मानसिक दिवालिएपन को नंगा कर दिया है. आजादी के छह दशक बाद हम अपनी बेटियों को तो समानता और अधिकार दे नहीं पाये दूसरी गौत्र या दलितों की बात कौन करे? दोनों घटनाओं पर एक लड़की इस समाज, देश, हमारे और आपके नाम एक खत लिखती है…

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तुम्‍हारे जन्‍म से ही

कायम है दुनिया

पर पता नहीं क्‍यों

तुम्‍हारे होने पर सबको एतराज है

हमारा अपना बनाया ये समाज है.

(राजू आनंद की पंजाबी कविता का अनुवाद)

अगर यह तुम्‍हारा समाज है तो इसे मिटा दो. अगर ये तुम्‍हारी रचना है तो इसे आग लगा दो. उस आग की रोशनी चतुर्दिक फैले अंधकार की दीवारों तक पहुंच सके तो उस पर लिखे इस सवाल का जवाब देना कि क्‍यों मर गई वह, क्‍यों मार दिया गया उसे? बहुत बातें करते हो समानता की और शिक्षा के फैलते उजियारे की, बहुत हो ली तुम्‍हारी विकास की नौटकीं. मिर्चपुर में तुम दलित की बेटी जिंदा जलते हुए देखते हो तो कोडरमा में एक होनहार पत्रकार मर जाती है. ऐसे तो कोई नहीं मरता. लो बजाओ आजादी का झुनझुना और छेड़ो सामाजिक समरसता की तान. ले आये आर्थिक विकास का रथ तुम्‍हारी चौखट पर भारत को शक्तिशाली और महाशक्तिशाली बनाने के‍ लिए. करो सवारी और करो अश्‍वमेध का शंखनाद. तुम्‍हारी समिधा में लकडि़यां न हों तो लड़कियां तो हैं ना, लड़की चाहे दलित की हो या ब्राह्मण की, सगौत्र या विजातीय, क्‍या फर्क पड़ता है? उसे कोई हक नहीं, खेलने, जीने न प्‍यार करने का. उसे हक न तो तुमने दिया न तुम्‍हारी रचना में रचे बसे इस समाज और कानून ने. दलित दलित रहे और बेटी उससे भी गई गुजरी हो गई. उसके लिए कुंड कभी संसद से कुछ मीटर दूरी वाला अशोक होटल बनता है तो कभी मिर्चपुर और कोडरमा. तुम क्‍या समझते हो बेटियों को हत्‍यारा यह समाज जिंदा है?

शायद तुम भूल रहे हो. लो मैं याद दिलाती हूं.. तुम उसी गौरवशाली इतिहास के वंशज हो जो मोहनजोदड़ो से शुरू हुआ और जिस सभ्‍यता के अवशेषों में सबसे अधिक नारी की देवीनुमा मूर्तियां मिली. ऋग्‍वेद के पुरूष सूक्‍त में उल्‍लेखित वर्ण व्‍यवस्‍था तो तुम्‍हारा ब्रह्मवाक्‍य बन गया लेकिन यह भूल गए कि उसी ऋग्‍वेद में कहीं लोपामुद्रा, घोषा व सिकता .. कितनी ही विदुषियों का सादर‍ जिक्र है. तुम भूल गए ना? सातवाहनों ने अपने नाम ही मां पर रखे थे. कैसे भूल गए और कहां गया तुम्‍हारा वह ढोंगी वाक्‍य ‘ यत्र  पूज्‍यते नारी तत्र रमते देवता’? सावित्री तुम्‍हें यम के पंजों से छुड़ा लाती है और गांधारी तुम्‍हारे कारण अपने जीवन में अंधेरा भर लेती है. और तुम हो कि कभी रावण बन उसे पर्णकुटी से उठाते हो कभी राम बन अग्निपरीक्षा लेते हो. क्‍यों करते हो यह सब, किस मनु ने पढाया यह मंत्र और किस मुनि ने दी तुम्‍हें यह दीक्षा?

शायद तुम्‍हें तो याद भी ना होगा संविधान का भाग तीन. मूल अधिकार. हमारी भावना के साथ किया गया वादा और सभ्‍य विश्‍व के साथ की गई संधि (एस राधाकृष्‍णन). अधिकार जीने का, बोलने का, समानता का, खेलने खाने का व अधिकार रोने हंसने का. अधिकार के राजदंड के साथ गर्व से चलने वाले तुम क्‍या जानो दूसरे के अधिकारों को. मीडिया, फिल्‍मों व टीवी पर रचे जलसाघरों से दूर आम आदमी, दलित या एक बेटी की राहों में बिखेरे गए कांटें तुम्‍हें कहां से नज़र आएंगे. जीडीपी के आंकड़ों, फोर्ब्‍स की सूचियों, एफडीआई, चीयरलीडर, अमिताभ के ब्‍लाग, शाहरूख की छींक वाली खबरों के कुछ किलोमीटर के दायरे से बाहर मीलों मील तक एक समाज रूपी जंगल है जहां जात भांत, गौत्र धर्म के ठेकेदारों की आरियां नयी पीढी के पौधों पर चल रही हैं. इसका तो तुम्‍हें भान नहीं ना!

बताओ तो सही, सदियों सदियों का यह तुम्‍हारा पाप का घड़ा कब भरेगा. और जिस दिन भरेगा उस दिन क्‍या करोगे कभी सोचा है. कभी रोना आता है तो कभी हंसी. किस समतामूलक, बराबरी के अधिकार वाले समाज के भ्रम में हो. इक्‍कीसवीं सदी की मर्करी लाइटों की रोशनी में अंधेरा ढो रहे हो. कहां जी रहे हो, बेटियों को गर्भ में मार देने वाले समाज में, उन्‍हें जिंदा जला देने वाली मानसिकता में? मर क्‍यूं नहीं जाते. मिटा क्‍यूं नहीं देते तुम्‍हारे इस आगलगे समाज को और क्‍यूं नहीं जला देते अपनी कथित आर्थिक सामाजिक उपलब्धियों के पुलंदों को. तुम जो भी हो.. राम, रावण, धृतराष्‍ट्र, राष्‍ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री या कोई और… मेरे सवाल का जवाब देना. क्‍यों मर गई वह… क्‍यों मार दिया गया उसे मिर्चपुर में और क्‍यूं मर गई वह कोडरमा में?

– एक लड़की (बेटी नहीं क्‍योंकि बेटी वाला समा‍ज तो तुम बना नहीं सके.)