सत्‍य चुराता नज़रें हमसे

बनाम मिर्जा के मलिक होने तक!

क्‍या समाचार चैनल वालों के भेन बेटी नहीं होती या वे अपनी अक्‍ल और सोच बाजार की खूंटी पर टांग सिर्फ और सिर्फ टीआरपी के लिए भागते हैं?

सानिया मिर्जा व शोएब मलिक जब भारत के हैदराबाद शहर में समाचार चैनल वालों की भीड़ को सफाई दे रहे थे तो अपने मन में पहला और पहला सवाल यही उठा. अपना मानना है कि शादी विवाह किसी भी व्‍यक्ति व परिवार का व्‍यक्तिगत आयोजन/फैसला होता है और उसे तमाशा नहीं ही बनाया जाना चाहिए. चाहे व शादी सानिया की हो या किसी ओर की. किसी न्‍यूज चैनल वाले श्रीमत ने यह सोचा है कि कभी उसकी भेन बेटी की शादी में ऐसा तमाशा हो और उसे मीडिया के बेतुके/ बेहुदा सवालों का जवाब देने के लिए आना पड़े तो कैसा लगेगा?

दरअसल सानिया- शोएब के इस कतिपय घटनाक्रम के कवरेज ने न्‍यूज चैनलों की मानसिकता, दशा व दिशा पर बात करने का एक और मौका दे दिया है.

अपन न तो कभी सानिया के प्रशंसक रहे हैं और न ही शोएब हमें कभी उम्‍दा क्रिकेटर लगे. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वे शादी कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं; सानिया का पहला प्‍यार और शोएब की दूसरी शादी.. क्‍या ये ऐसे सवाल हैं जिनकी पड़ताल में टीवी मीडिया हफ्ते भर से हलकान हुआ जा रहा है. आईपीएल है या सानिया है. रही सही महिमा बाबाओं और सनसनियों की है. बाकी तो कुछ है ही नहीं. इसे दर्शकों के मुहं पर तमाचा नहीं तो क्‍या कहिएगा. जो दिखाएंगे, वही देखोगे!

पाप्‍पराजी और पीत पत्रकारिता जैसे शब्‍दों से अपन तब परिचित हुए जब राजकुमारी डायना सड़क हादसे में मारी गईं. सेलेब्रटीज की व्‍यक्तिगत जिंदगी में ताकाझांकी करने वाली पत्रकारिता के लिए यह कलंक था. लेकिन न तो उससे पत्रकारिता करने वालों ने सीखा न पत्रकारों के प्रति क्रेजी लोगों ने. बात आई गई हो गई. बीत दसेक साल में भारत में न्‍यूज चैनलों की बाढ आई. शुरू में उम्‍मीद थी कि यह नया मीडिया है जो समय के साथ परिपक्‍व, संवेदनशील तथा जवाबदेह हो जाएगा. हुआ इसका ठीक उल्‍टा. ज्‍यों ज्‍यों चैनलों की संख्‍या व उम्र बढ़ी उनका कंटेंट उतना ही खराब या बदतर होता गया. इन बंधुओं ने हर ओर कादा कीचड़ कर दिया.

इस तरह के नासमझ मीडिया के मुहं पर पहला तमाचा कांशीराम ने मारा था. आज हालत यह है कि अमिताभ बच्‍चन, जया बच्‍चन हो या सानिया मिर्जा… सभी उसे उपदेश देने या आग्रह करते नज़र आ रहे हैं.

वैसे सानिया को फर्श से अर्श पर पहुंचाने बहुत बड़ा योगदान न्‍यूज चैनल वालों का भी है. तो अब उसे राजी खुशी विदा भी होने दो भाई. वो जहां भी रहे खुश रहे क्‍योंकि बेटी तो ससुराल में ही अच्‍छी. सवाल यही है कि इन चैनल वालों का भेन बे‍टी, रिश्‍ते नातों व सरोकारों से क्‍या लेना देना. टीआरपी ही इनका सबकुछ है. कुछ हजार की नौकरी और स्‍क्रीन पर चेहरा दिखने की ललक वाली एक भरी पूरी पीढी है जो माइक व कतिपय अस्‍त्रों के साथ पूरे सामाजिक ताने बाने पर पिली पड़ी है. अपन इसे युवाओं में आइडेंटिडी क्राइसेस का नमूना मानते हैं जिसका बाजार दोहन कर रहा है. न्‍यूज चैनलों पर चीखते चिल्‍लाते युवा और क्‍या हैं?

प्रभाष (जोशी) जी ने इस बारे में कई बार लिखा. शेखर गुप्‍ता ने इंडियन एक्‍सप्रेस में हाल ही में एक आलेख में इसी मुद्दे को उठाया है. बीते दस साल में न्‍यूज चैनलों पर सबसे अधिक पूछा गया सवाल क्‍या है- आप कैसा महसूस कर रहे है. मरण और या परण, यही सवाल सामने आ जाता है जो चैनल वालों में बौद्धिक अकाल का ही एक उदाहरण है. कांशीराम के थप्‍पड़ से बात देहरादून में बस चालकों द्वारा पत्रकारों को सरियों से पीटे जाने तक आ गई है. जो हमारे लिए चेतावनी है कि अब भी समय है-‘चैन से सोना है तो जाग जा‍इए’.

टेलीविजन का अविष्‍कार पश्चिम में बेयर्ड ने किया और इस पर पहली बार मानवीय चेहरा 1925 में दिखा. उसकी पश्चिम के विचारकों ने बहुत पहले ही टेलीविजन को ‘ड्रग इन प्‍लग’ यानी बटन दबाओ और नशा करो करार दिया. वहां के सामाजिक ताने बाने को टीवी ने चोट पहुंचाई है व किसी से छुपा नहीं. वैसे ही हालात भारत के होने वाले हैं. यानी टेलीविजन के रूप में छुपा बाज़ार का अश्‍वमेघी घोड़ा हमारी बैठकों से श्‍यनकक्षों और हमारे दिमाग में घुसता चला गया. ओशो ने कभी समाचार पत्रों – पत्रिकाओं के लिए सवाल उठाया था कि ‘वे समाज को देती क्‍या हैं जो उन्‍हें पढा जाए’ न्‍यूज चैनलों पर या टेलीविजन के लिए यह सवाल और बड़े ढंग से लागू होता है. अपन भी मानते हैं कि इसके लिए टेलीविजन वाले या उसके लिए काम करने वाले ही दोषी नहीं है यह तो बाज़ार का किया धरा है जिसके लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है, जहां बिकने की अपना संभावनाएं हैं.

सानिया शोएब प्रकरण में न्‍यूज चैनलों ने फिर अपनी स्थिति और हालात बता दी है. अभी तो शादी में काफी दिन है अगर यही रवैया रहा तो मिर्जा (सानिया) के मलिक (शोएब) होने तक कलई और खुल जाएगी.  फिक्‍की केपीएमजी का सर्वे कहता है कि टेजीविजन उद्योग 2014 तक बढ़कर 521 अरब डालर का हो जाएगा. हम खुश हैं और बहुत खुश भी. खुश इसलिए टीवी मीडिया में नहीं है और बहुत खुश इसलिए कि घर में टीवी नहीं है!!!!

शेरजंग गर्ग की एक कविता (न्‍यूज चैनल वालों के लिए) है…

सत्‍य चुराता नज़रें हमसे इतने झूठे हैं हम लोग,

इसे साध लें उसे बांध लें, सचमुच खूंटें हैं हम लोग!

|बात निकली है तो दूर तलक जाएगी और इसे एक ही आलेख में समेटा नहीं जा सकता|