यह फागुन है. रात में बूंदा बांदी हुई थी और दिन में गर्मी ऐसी कि स्‍वेटर आदि भी पहनने का मन ना करे. पहनो तो तन को कीड़ी सी खाए. थार में दिन में भले ही गर्मी हो लेकिन रात सर्द होती है. ज्‍यूं ज्‍यूं रात ढलती है, वातावरण में नमी भी बढती जाती है. सूरज की तेज तीखी होती किरणों और चांदनी की शीतलता का भारी अंतर मानवीव धैर्य का इम्‍तहान ले रहा है. और फागुन है कि हर कहीं फगुनहट दिखने लगी है. फाग (फागुन, फागण) है तो राग है, राग है तो चंग है और है मस्‍ती; पौ मा (पौष माघ) की सर्दी में सिकुड़ा जीवन मानों नए सिरे से अंगड़ाई ले रहा है. और कहीं कोई नवयौवना गा रही है.. होळिया में उड़े रे गुलाल, कइयो रे मंगेतर ने..

लोग संभल रहे हैं कि कहीं जाती हुई सर्दी अपने रंग में रंग फाल्‍गुन को बैरंग न कर दे. इसी कारण जड़ावर शरीरों से जुड़े हैं और लोग बाग अभी अंदर ही सो रहे हैं. बाहर आंगन या बागळ में सोना शुरू नहीं किया है. जाती हुई सर्दी का डर जो है. स्‍वेटर, रजा‍इयां सिमटे नहीं हैं और गुदड़ी अभी भीतर वाली साळ में ही समेट कर रखी हुई है. बीच बीच में कई बार कुहरा भी मौसमी कैनवास पर अलग रंग बिखेर जाता है.

फागण यानी भारतीय लोकजीवन का सबसे रंग रंगीला महीना. क्षेत्र में इसका खुलता रंग दिखने लगा है. शहरी कांकड़ से निकलते ही यह दिखता है. चित्‍त को खींचता है. रंग बदलती सरसों व कहीं कहीं दिखती कणक की नवपल्‍लवित बालियों के ऊपर फगुनहट तिरती दिखती है. इसकी गमक हर कहीं है. शांत स्थिर वसुंधरा से लेकर कलकल निश्‍चल बहती हवा तक में. जैसे जीवन का हर अंग फगुनहट में पगने लगा है.

इस समय सूर्य की गति का उत्‍तरायण काल है. पूर्व से निकल कर सूर्य अपने क्रांतिवृत्‍त में उत्‍तर की ओर खिसकता है. इस दौरान शरीर छोड़ने वालों की उर्ध्‍व गति होती है. बताते हैं कि सूर्य की दूसरी गति के इस काल की प्रतीक्षा में भीष्‍म पितामह लंबे समय तक शरशय्या पर लेटे रहे थे. कच्‍चे पक्‍के दिन, दो ऋतुओं का संधिकाल. सरसों की गांदलें कड़वी हो रही हैं. बथुआ व पालक पक गई है. मूंगरे की फलियां पक गई हैं. छोले की कुट्टी बन रही है. थोड़े ही दिन में ‘होळे’ बनने लगेंगे. कुछ किसान गेहूं में खोदी वगैरह में लगे हैं, तो कुछ ने दांतियों के दांते निकलवा लिए हैं. जौ, बरसीम अभी है. कई घरों में कड़बी और डोके हैं.

यत्र-तत्र, चौखूंट फागण के आने से पहले का रंग बिखरे हैं. कणक के क्‍यारों की डोळियों, खाळों से लेकर घरों के चूल्‍हे और हारों तक. छा (छाछ) अब ठंडी नहीं लगती और उसे डांगरों को पिलाने या बंटे में नहीं डालकर, संभाला जाने लगा है. कढ़ी में डालने के लिए गूंदली तैयार है, लहसुन के पत्‍ते भी.

जिन घरों में पळींडे बचे हैं, वहां उनकी लीपा पोती हो रही है. इंडुनी संभाली जाने लगी है. मौसम बदल रहा है, और जीवन भी. फागण जो है.

निगम साहब की पंक्तियां हैं..

फगुनहट ने बो दिए

इंद्रधनुष के रंग

धूप महकने सी लगी

लगे खनकने अंग.

(आपको भी फागण मुबारक, ये रंग मुबारक!)