नीरज दइया के शब्‍दों में वे वक्‍त के साथ आगे बढ़ने वाले कवि हैं. वे चंद्र सिंह बिरकाळी के सबसे चहेते कवियों में रहे और तैस्‍सीतोरी के धोरे पर काव्‍य पाठ करने वाले कवियों में से एक हैं. कवि हैं और दिल से कवि हैं. ‘जागती जोत’ के संपादक रहे व राजस्‍थान क्रिकेट संघ की समिति के सदस्‍य भी. ओम पुरोहित कागद… जिनकी मानव मात्र में भी उतनी ही आस्‍था जितनी ज्‍योतिष विद्या में. उनका मानना है कि रचनाकार को जमीनी होना चाहिए क्‍योंकि वही उसकी थाती है. कागद जी के दो काव्‍य संग्रह पिछले दिनों आए और विशेषकर कालीबंगा पर लिखी उनकी कविताओं की खासी चर्चा है. लीक से हटकर और इस विषय पर लिखी अपने आप में अनूठी कविताएं. हनुमानगढ़ में रहने वाले कागद जी नई कविताओं पर हाल ही में चर्चा हुई..

कालीबंगा पर कविताएं कैसे ?

कुल 20 कविताएं हैं कालीबंगा पर.. इतिहास की सबसे प्राचीन नदियों में से एक सरस्‍वती हमारे क्षेत्र से बहती थी. लगभग 300 किलोमीटर के क्षेत्र में उस सभ्‍यता संस्‍कृति के अवशेष बिखरे हुए हैं. हड़प्‍पा मुअन जो दरो काल या उससे भी पहले की सभ्‍यता के अवशेष कालीबंगा में मिले. क्षेत्र में लगभग ऐसे थेहड़ हैं. इस सभ्‍यता, कालीबंगा से शुरू से ही जुड़ाव रहा, शुरुआत खुदाई वगैरह, वहां मिली चीजें, हालात को देखा तभी से मन में कुछ खदबदा रहा था जो इन कविताओं के रूप में बाहर आया है. क्षेत्र और कालीबंगा से भावनात्‍मक लगाव ने भी उद्वेलित किया.

इतिहास व ऐतिहासिक स्‍मारकों की अनदेखी ?

दरअसल हमारा इतिहास या अ‍तीत बहुत ही वैभवशाली रहा है. चप्‍पे चप्‍पे पर इतिहास का कोई ने कोई वरका किसी न किसी रूप में मिल जाता है. सभ्‍यताओं के अवशेष मिलते हैं, कहानियां मिलती हैं, लोककथाएं मिलती हैं, हमारे यहां हजारों बोलियां हैं जिनके अपने शब्‍द भंडार हैं. शायद इसी ‘अधिकता’ के कारण इतिहास और ऐतिहासिक धरोहर के प्रति भावुकता भरा जुड़ाव हमारे यहां देखने को नहीं मिलता. हो सकता है कि कालीबंगा के वाशिंदों को ही कालीबंगा के इतिहास से जुड़ाव नहीं हो लेकिन इससे सचाई झुठला नहीं जाती.

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राजस्‍थानी भाषा व मान्‍यता ? 

राजस्‍थानी समृद्ध भाषा है. 13 करोड़ लोग इसे बोलते हैं. भारत के अलावा पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश तक में इसे बोलने वाले हैं. रूस में तो एक पूरा गांव है  राजस्‍थानी बोलने वालों का. तो जो मान्‍यता की औपचारिकता बची है उसे जल्‍द पूरा होना चाहिए. इसका कोई विकल्‍प नहीं है. इससे कम बोली जाने  वाली भाषाओं को सरकारी मान्‍यता मिल गई है तो इसके क्‍यूं नहीं. सवाल कई स्‍तरों पर है जिसे जल्‍द निपटाया जाना चाहिए. राजस्‍थानी भाषा के लिए आंदोलन की दिशा ठीक, दशा खराब. दु:खद यही है कि यह आंदोलन राजनीतिक स्‍तर पर पैठ नहीं बना पाया.

राजस्‍थानी साहित्‍य ?

बहुत अच्‍छी स्थिति में और क्षेत्रीय भाषाओं में सबसे समृद्ध साहित्‍य में से एक. बहुत अच्‍छा व प्रभावी लिखा जा रहा है. सराहा भी जा रहा है, पहुंच भी  पढ़ी है बस पाठकों का थोड़ा टोटा है.. टोटा खरीदकर पढ़ने वालों के रूप में है. पढ़ने की संस्‍कृति व आदत तो डालनी ही होगी. खासकर हमारी पीढी में  कई प्रभावी रचनाकार सामने आए हैं.. जिनसे उम्‍मीदें बंधती हैं या जो उम्‍मीदों पर खरे उतरे हैं.

कुछ नाम?

अनेक हैं.. हमारी पीढ़ी में मालचंद तिवाड़ी से लेकर मंगत बादळ, उपेंद्र उम्‍मट, बुलाकी शर्मा, मिठेश निर्मोही, ज्‍योतिपुंज, मुकुट मणिराज, भरत ओळा, सत्‍यनारायण सोनी, रामस्‍वरूप किसान व विनोद स्‍वामी तक ने अच्‍छा काम किया है.. (कुछ नाम छूटें तो अन्‍यथा न लें) .. पहचान व प्रतिष्‍ठा पाई है. यह काम आगे बढता दिखता है.

राजस्‍थानी साहित्‍य की विशेषता?

थार का मानस विषमताओं में जीता है. अकाल, पानी की कमी, जेठ में तपती धरा तो पो माह में कड़कड़ाती ठंड… तो जीवन में यह जो द्वंद्व है वही राजस्‍थानी साहित्‍य में दिखता है और उसे वास्‍तविकता के धरातल से जोड़ता है. राजस्‍थान का साहित्‍य आम आदमी से लगता है, जमीन से जुड़ा है. यह सजावटी नहीं और न ही इसमें पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति से जुड़ने की अवांछित छटपटाहट दिखती है. वर्तमान अच्‍छा, भविष्‍य बेहतर लगता है.

क्षेत्रीय भाषा में लिखने की सीमाएं?

ऐसा तो नहीं लगता. ज्ञान के प्रवाह में भाषा बाधा नहीं बनती. राजस्‍थानी अपने आप में व्‍यापक व समृद्ध भाषा है.. फिर बदलते वक्‍त के साथ पहुंच के साधन भी बढे हैं. इंटरनेट हो या अनुवाद की बात.. चीजें काफी बदली हैं.

कागद : केसरीसिंहपुर में जन्‍में कागद राजस्‍थानी व हिंदी में समान रूप से प्रभावी दखल रखते हैं. राजस्‍थानी में अंतस री बळत, बात तो ही,  कुचरण्‍यां व पंचलड़ी तथा हिंदी में धूप क्‍यों छेड़ती है, आदमी नहीं है, थिरकती है तृष्‍णा (कविता संग्रह), मीठे बोलों की शब्‍दपरी व जंगल मत कोटा  आदि बाल साहित्‍य प्रकाशित. प्रदेश के प्रतिनिधि कवियों के संकलन ‘रेत पर नंगे पावं’ में कविताएं. इन्‍हें राजस्‍थानी साहित्‍य अकादमी उदयपुर से  ‘आदमी नहीं है’ के लिए सुधींद्र पुरस्‍कार तथा राजस्‍थानी भाषा व साहित्‍य अकादमी बीकानेर से गणेशी लाल व्‍यास पुरस्‍कार मिल चुका हैं. उनका  ब्‍लाग http://omkagad.blogspot.com है.