गांव के बड़े से आंगन

उससे भी बड़ी बाखळ में


चिड़ी सी चहकती

हवाओं सी नाचती

महुए सी महकती

(और) सर्दी की धूप सी खिलती

हमारी बेटी


मेमने से खेलती

बिल्‍ली से झगड़ती

गाय से भागती

(और) ऊंट से डरती है.


दूध से बिदकने

दही पे मचलने

दळिए को गटकने

(और) हांडी को खुरचने वाली

हमारी बेटी


डिग्‍गी पे नाचती

चारपाई पे कूदती

रेत में गडमडाती

(और) कादे में मुस्‍कुराती है.


बाबा मा चाचू नाना बुआ

की लाडली

मासी मामा भैया दीदी

(और) बास के ढेर सारे बच्‍चों से लुका छिपी

खेलने वाली हमारी बेटी


दिल्‍ली में

तीसरे माले के दो कमरों के मकान में

गुमसुम व चिड़चिड़ी हो जाती है

रिश्‍तों, पौधों व सखियों का उसका वटवृक्ष

कढी पत्‍ते के गमले में सिमट जाता है

(और) आंखों में उग आते हैं सवालों के बीहड़.


सवाल कि

क्‍यूं हमने सीमेंट के जंगल उगाए,

और नहीं रखी किसी बगिया के लिए जगह

क्‍यूं छोड़ आए हम रिश्‍तों के पौधे

गांव मलकाना खुर्द या रामरख की ढाणी में

क्‍यूं गांव गांव ही रह गए, शहर कुछ ज्‍यादा ही शहर हो गए

जहां गाय का रंभाना ही बड़ी बात, गाय पालना तो कौड़ी है दूर की

स्‍नेह की नदियां और लगाव के सारे सोते सूख गए

क्‍यूं महानगरों में हैं लाड़ की खराब टोंटियां

और सूखती जीवन को सींचने वाली जड़ें.


इन सवालों के साथ

हमारे विकास व विनाश के बीच की रेखा को

मिटा देती है हमारी बेटी

जैसे कोई बच्‍चा,

कागज पर बने ईश्‍वर को मिटा देता है रबड़ से.

दिल्‍ली में हमारी बेटी

गांव जाने को मचलती है.

। बाखळ यानी आंगन के बाहर का हिस्‍सा. जहां गाय का रंभाना .. प‍ंक्ति साभार हेमंत शेष, कागज पर बने ईश्‍वर पंक्त्‍िा .. साभार त्रिभुवन, छाया नेट से।