आज मैं कुछ कहना चाहता हूं. मेरी बात सुनकर कुछ लोग चौंकेंगे और शायद हंसेंगे भी कि महाभारत का कर्ण कैसे बोल रहा हैॽ सदियों पहले कुरूक्षेत्र के पास कुंवारी भूमि पर चिरानिद्रा में सो चुका कर्ण कैसे बोल सकता है. मुर्दे कब से बोलने लगेॽ लेकिन मित्रो, एक समय आता है जब सन्‍नाटे चीखने लगते हैं और आजीवन मौन का व्रत धारण किए लोगों को भी बोलना पड़ता है. क्‍योंकि, हाड़ मांस के जीवित पुतले जब जब मृतकों की तरह आचरण करते हैं तो समाधियां चिल्‍लाने लगती हैं! कोई ‘मरा हुआ’ उठता है और अंधेरे की काली भींत पर उजाले की गुलमेख ठोंकता है. रोशनी ही मानव जीवन की सचाई है, अंधेरा नहीं! वैसे भी मैं वह दानवीर कर्ण नहीं हूं. मैं तो आपके समय का कर्ण हूं, आपका कर्ण हूं. इक्‍कीसवीं सदी का कर्ण, जो आपसे कई बार मिला है, मिलता रहता है. बस दुनियादारी की व्‍यवस्‍तताएं ही ऐसी हैं कि न तो अपनी बात कह पाता हूं और न आप सुन पाते हैं. तो आज मैं अपने मन की बात कहने जा रहा हूं. कहते हैं कि कहने से मन हलका हो जाता है….

हम्‍म... तो ग्रीनलाइट हो गई है! चौराहे के उत्‍तर में ली मे‍रेडियन की ओर से वाहनों का काफिला चल निकला है. साइकिल, स्‍कूटर, आटो से लेकर लो फ्लोर बसें व बीएमडब्‍ल्‍यू जैसी बड़ी महंगी महंगी गाडि़यां… खूंटा तोड़कर भागे पशु की तरह मचलते वाहन.. ! सुबह से पैन के चार पांच पैकेट बेच चुका हूं. शाम तक दसे‍क बिक जाएंगे. फिर अपने घर नरेला चला जाउंगा. मैं अकेला नहीं हूं. जीवन के इस समर में सुबह से उतरने के लिए मेरा पूरा परिवार आता है.  अपनी तो यही जीवनचर्या है, दिनचर्या है. सात आठ साल.. जब से होश संभाला है इस चौराहे या लालबत्‍ती से अपना नाता है, मानों एक नाड़ यहीं बंधी है. बस दिशा बदलती रहती है और बदलते रहते हैं हाथ में पकड़े सामान .. कलम, टार्च, रूमाल, किताबें, पेपर तो कभी पानी की बोतल.. बाकी क्‍या बदलता हैॽ

कई बार हंसी आती है. इतिहास के उस कर्ण से अपना कोई नाता नहीं है, अपना भाग्‍य प्रारब्‍ध कहीं भी उस कर्ण की लकीरों से मेल नहीं खाता. न ही हम गंगा मैया के किनारे की किसी रमणीय चंपानगरी में पैदा हुए. हां, इतना जरूर है कि अपन  जीवन भी है कि हालात की निर्दयी कंटीली झाडि़यों में उलझकर चीथड़े चीथडे़ सा होता रहता है.  यही लालबत्‍ती अपना खेल, स्‍कूल और मैदान है. कुछ सामान खरीद लेते हैं तो कुछ मुस्‍कुरा देते हैं.. इसी में दिन कट जाता है. लोग बात नहीं करते, ज्‍यादातर तो गाड़ी के सीसे ही नीचे नहीं करते. एक दो ने पूछा मेरा नाम और सुनकर बोले ‘कर्ण’! जैसे मैं कर्ण हो ही नहीं सकता! राष्‍ट्रीय राजधानी की चमचमाती पेवर रोड़ के एक व्‍यस्‍त चौराहे पर पेंसिल बेचने वाले लड़के का नाम कर्ण कैसे हो सकता हैॽ समय की चादर पर इतना बड़ा पैबंदॽ उनकी आंखों में हैरानी से मुझे कोफ्त होती है और मैं उनकी गाड़ी से दूर चला जाता हूं.

मैं .. मैं .. म्‍म्‍म्‍ा मैं .. इस समय से भी दूर जाना चाहता हूं. मैं हिमालय की चोटी पर जाकर चिल्‍लाना चाहता हूं – हां मेरा नाम कर्ण है. मैं कर्ण हूं. इक्‍कीसवीं सदी के भारत का कर्ण! मैं चाहता हूं कि काल सेंटरों की औनी पौनी कमाई की बीयर में मदमस्‍त युवा पीढ़ी मेरी बात सुने, जीडीपी के आंकड़ों से खेलने वाले अर्थशास्‍त्री मेरा नाम जानें, देश को सुपरवार बनाने की चिंता में घुले जा रहे राजनेता मेरी तरफ देखें और पोर्न स्‍टार बनने का ख्‍वाब देखने वाला शाहरुख बताए कि उसके शहर के एक चौराहे के इस कर्ण का भविष्‍य क्‍या हैॽ मैं चाहता हूं कि यह कायनात, यह धरती, ये आसमां, ये ऊंची इमारतें, मेट्रो, गंगा मैया, हिंद महासागर, इंडिया गेट, लाल किला, कुरूक्षेत्र का मैदान, थार का रेगिस्‍तान, दक्‍खन का पठार, बंगाल की खाड़ी .. और आप सब, बताएं मेरा नाम कर्ण क्‍यों नहीं हो सकताॽ  अगर है तो क्‍यों विकास के कतिपय राजवस्‍त्रों से मुझे चीथड़ा समझकर अलग किया जा रहा हैॽ

लूणकरणर, राजस्‍थान के बस अड्डे पर बसों में सामान बेचने वाले दो दोस्‍त.

कहते हैं कि दानवीर कर्ण का जीवन चीथड़े के समान था. लेकिन जीवन के झंझावतों से टकराते हुए अपने पत्‍ते टहनियां गंवा देने वाला पौधा, वातानुकूलित कमरे में लगे मनीप्‍लांट से कमतर कैसे हो सकता हैॽ भौतिक जीवन में आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण, उदारीकरण, वैश्विकरण जैसे अनेक ‘करणों’ को अपनी सुख सुविधा के लिए अंगीकार करने वाला यह समाज हम जैसे कर्णों को क्‍यों हिकारत की नजर से देखता हैॽ आपके कथित ‘कर्णों’ (या कर्मों) ने चमचमाते राजमार्ग बनाए, लालबत्‍ती वाले चौराहे बनाए लेकिन वहां फुटकर सामान बेचने वाले कर्णों को भूल गएॽ शायद यही कारण कि जितनी ज्‍यादा लालबत्तियां उतने ज्‍यादा कर्ण.. दिल्‍ली से लेकर चेन्‍नई तक और पटियाला से लेकर लूणकरणसर तक.!

अगर आप मेरी कहानी सुनकर यह सोच रहे हैं कि मैं भी बाल भिखारियों या बाल श्रमिकों की तरह की एक समस्‍या हूं तो भूल जाइये. भीख मांगना कर्ण की गति नहीं है. हो ही नहीं सकती! जिस दिन कर्ण भीख मांगेगे उस दिन इतिहास का चक्र उल्‍टा घूमेगा और वक्‍त की महाभारत नए सिरे से लिखी जाएगी. क्‍योंकि कर्ण भीख मांगता तो वह कर्ण नहीं होता, सूर्य का बेटा नहीं होता, एक सारथी का लाडला नहीं होता, शोण का बड़ा भाई नहीं होता, राधा माता का वसु नहीं होता.. कर्ण नहीं होता तो महाभारत नहीं होती. एक इतिहास नहीं होता. इस देश का सबसे बड़ा महाकाव्‍य नहीं होता. और सच किसी की इच्‍छा से न तो चलता है और न बदलता है. सचाई यही है कि जब तक कर्ण होगा, महाभारत होगी और जीवन को कोई न कोई मैदान कुरूक्षेत्र में बदलेगा. हमारे इस चौराहे रूपी रणक्षेत्र से हस्तिनापुर की अधिक दूरी नहीं है. वक्‍त का फेर देखिए कि अर्जुन नाम का मेरा भानजा है जो भी इसी बत्‍ती पर सामान बेचता है. इस जमाने के धृतराष्‍ट्र, भीष्‍म, शकुनि, अश्‍वत्‍थामा, नकुल, सहदेव, दुर्याधन, भीम भी तो कहीं होंगे ही. संसद पश्चिम में मुश्किल 200 मीटर की दूरी पर है!

दिल्‍ली में एक लालबत्‍ती पर कलम बेचता बच्‍चा.

समय, अगर समय है तो यही समय है कि मेरे, उस हर कर्ण के .. जिसके हिस्‍से की रोशनी आधुनिकीकरण की चकाचौंध ने छीन ली है, को पहचान दी जाए. उसका आइडेंटिटी क्राइस मिटाया जाए. अगर आप राजमार्ग और पेवर रोड बनाना चाहते हैं तो बनाइए पर उनकी लालबत्तियों पर सामान बेचते कर्ण के भविष्‍य की भी सोचिए.. ! अभी बस इतना ही. लाल बत्‍ती हो गई है. बाकी कहानी बाद में.

।। आपका कर्ण, राष्‍ट्रीय अभिलेखागार लालबत्‍ती, राजेंद्रप्रसाद रोड, संसद के पास, नयी दिल्‍ली।

(मेरी बात- कुछ बच्‍चे हैं जो हर शहर की किसी लाल बत्‍ती या बस अड्डे और स्‍टेशन पर सामान बेचते मिल जाएंगे. दिल्‍ली की लाल बत्‍ती पर वे किताबें, पत्रिकाएं बेचते हैं तो लूणकरणसर के बस अड्डे पर मौठ के पकोड़े व आइसक्रीम. ऐसे बच्‍चों से मिलना होता रहता है. कई बार सोचा कि इन पर कविता लिखूं, कई बार कहानी लिखने का मन बनाया. लेकिन जब कलम उठाई तो न दिल ने साथ दिया ने आंखों न. यह ऐसा मुद्दा है जिस पर हम नहीं लिखना चाहते क्‍योंकि जब इन बच्‍चों को कुछ पैसों के लिए जान जोखिम में डालकर गाडि़यों के पीछे भागते देखते हैं तो अपने दिल में हूक उठती है. आंखें बंद करने पर लगता है कि इस देश में लाल बत्तियों के जंगल उग आए हैं जहां हर ओर से आवाज आ रही है बाबूजी ये ले लो; बाबूजी वो ले लो. ऐसे में आजादी, संसद, लोकतंत्र, जीडीपी, परमाणु समझौता जैसे शब्‍द आपस में इतने गड्डमड हो जाते हैं कि सब बेमानी सा लगता है. ये भीख मांगने वाले बच्‍चे नहीं हैं. मेहनकश लोग हैं. दोस्‍तो, इनके लिए कुछ किया जाना चाहिए. अनिवार्य शिक्षा के लिए या बालश्रम के विरोध में बने काननू इनके लिए नहीं हैं. इनकी श्रेणी ही अलग है. ये ऐसे बच्‍चे हैं जो मेहनत करते हैं, करना चाहते हैं.  अपना मानना है कि इनके हुनर का लाभ उठाया जाए और इनका जीवन बेहतर बनाया जाए ताकि एक चौराहे पर साथ साथ सामान बेचने वाले कर्ण अर्जुन नाम के ये बच्‍चे आने वाले समय हमारे पूरे समाज के खिलाफ महाभारत का शंखनाद न कर दें. कर्ण नाम एक ऐसे ही बच्‍चे को केंद्र में रखकर ऊपर की बात लिखी है. कथावस्‍तु का शिल्‍प और शब्‍द शिवाजी सावंत लिखित महारथी कर्ण की जीवनी ‘मृत्‍युंजय’ से‍ साभार लिए गए हैं.)