धरा की जैव विविधता पर संकट के बादल लगातार गहराते जा रहे हैं. थार की पाटा गोह हो या फोग का पौधा, गंगा की डाल्फिन हो अथवा तंजानिया का किहांसी स्‍प्रे मेंढ़क.. सब का अस्तित्‍व संकट में है. वक्‍त आ गया है कि इस ओर गंभीरता से ध्‍यान दिया जाए और सक्रियता से कदम उठाए जाएं.

घटते आश्रय स्‍थल और बढते खतरों के कारण अनेक जीव संकट के दौर में हैं.

संकट का संकेत

थार के राष्‍ट्रीय मरू उद्यान की जैव विविधता खतरे में है. वनस्‍पति की विभिन्‍न प्रजातियों के साथ साथ रोही गादड़, रोही बिल्‍ली, पाटा गोह जैसे जंतुओं के अस्तित्‍व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. जीव विज्ञानियों का कहना है कि इस जैव विविधता को संरक्षित करने की तत्‍काल जरूरत है और अगर इस दिशा में सक्रिय व प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो अनेक और प्रजातियां निकट भविष्‍य में लुप्‍त हो जाएंगी. जैव विविधता पर मंडराते खतरे का यह एक संकेत भर है जिसका असर जैसलमेर या बीकानेर संभाग विशेष तक सीमित नहीं है. प्रदेश से लेकर देश और दुनिया भर में ले दे कर कमोबेश यही हालात हैं, चाहे वह वह थार का रेगिस्‍तान हो, गंगा  हो, हिमालय के ग्‍लेशियर या तंजानिया की कोई नदी. थार से लेकर तंजानिया तक जैव विविधता संकट में है कारण भले ही अलग अलग क्‍यों न हों लेकिन सचाई यही है कि विभिन्‍न तरह के पौधे बूटे बूटियों.. जंतु कीट पतंगों की संख्‍या लगातार कम होती जा रही है. भारत में कुछ दिन पहले तक गिद्धों के गायब होने पर चिंता जताई जाती थी. इन्‍हें बचाने के लिए अभियान चले. श्राद्ध के समय कौओं का नहीं आना अखरा तो अब चिड़ी गौरेया की घटती संख्‍या प्रकृति प्रेमियों की पेशानी पर चिंता की रेखाएं उकेर रही हैं.

आईयूसीएन के आंकड़े

अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर बात की जाए तो पशु पक्षियों के संरक्षण पर काम करनेवाली संस्था आईयूसीएन की नई रपट के अनुसार दुनिया में पाए जानेवाले जीवों में से एक तिहाई लुप्त होने की कगार पर है और ये ख़तरा हर दिन बढ़ता जा रहा है. आईयूसीएन की रेड लिस्‍ट के अनुसार 47,677 में से कुल मिलाकर 17,291 जीव प्रजातियां गंभीर ख़तरे में हैं. इनमें से 21 प्रतिशत स्तनधारी जीव हैं, 30 प्रतिशत मेढकों की प्रजातियां हैं, 70 प्रतिशत पौधे हैं और 35 प्रतिशत बिना रीढ़ की हड्डी वाले यानि सांप जैसे जीव हैं. भारत के बारे में रपट में कहा गया है कि पौधों तथा वन्‍यजीवों की कुल 687 प्रजातियां लुप्‍त होने की कगार पर हैं. इनमें 96 स्‍तनपायी, 67 पक्षी, 25 सरीसृप, 64 मछली व 217 पौध प्रजातियां शामिल हैं. आईयूसीएन की यह रपट जैव विविधता पर सबसे विश्‍वसनीय मानी जाती है क्‍योंकि इस रेड लिस्ट दुनिया भर में फैले हज़ारों वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर बनती है.

यह रपट जैव विविधता पर मंडराते खतरे की भयावहता का नमूना है. राजस्‍थान के बारे में ऐसा कोई आधिकारिक सर्वेक्षण तो नहीं आया है लेकिन पर्यावरण व प्राणी विद् कहते हैं कि जैसलमेर क्षेत्र के 3162 वर्ग किलोमीटर में फैले मरू उद्यान में लगभग 120 तरह के जीव- जंतु व कीट रहते हैं तथा सैकड़ों तरह के पेड़ पौधे जड़ी बूटिंयां उगती हैं. इन सब पर भारी संकट है. उत्‍तर-पश्चिमी राजस्‍थान में बीकानेर संभाग का एलएनपी (नहर) क्षेत्र को 10,000 से अधिक वन्‍य जीवों की शरणस्‍थली कहा जाता है और निजी भूमि पर जैव विविधता के लिहाज से यह एशिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में है, वहां भी हालात अच्‍छे नहीं हैं.

जैव‍ विविधता पर संकट जीवों से लेकर अनेक वनस्‍पतियों, पौधों तक व्‍यापक है. (छाया: पुष्‍पेंद्र)

घटते आश्रय स्‍थल, बढता खतरा

जैव विविधता पर इस मंडराते खतरे के कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण है उस भूमि या स्‍थान का कम होना जहां ये वनस्‍पतियां पलती फूलती हैं या ये जीव जंतु रहते हैं. जलवायु परिवर्तन निसंदेह रूप से एक और बड़ा कारण है. बढ़ती मानवीय हलचल, सिंचाई क्षेत्र के विस्‍तार, शिकारियों का कहर तथा पेयजल जैसी सुविधाओं का अभाव. जैव विविधता पर इस मंडराते खतरे को अनेक रूप में देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए राजस्‍थान के बीकानेर संभाग में नहरी प्रणाली विशेषकर राजस्‍थान नहर के आने के बाद से बूर व फोग, खींप, सीणिया, पिल्‍लू, घंटील, लाणो, रींगणी, झींझण आदि पौधे, भुरट, प्‍याजी, गोखरू, कंटाला, कानकतूरा, हिरणखुरी आदि घास और रोहिड़ा, झड़बेरी, अरंड जैसे दरख्‍त तथा तूंबे की बैल जैसी अनेक वनस्‍पतियां लुप्‍त प्राय: हैं. इसी एलएनपी नहर क्षेत्र में पक्‍की नहरों में डूबने से अनेक हिरणों की मौत हो चुकी है. दरअसल ये हिरण पानी पीने या कुत्‍तों आदि से बचने के चक्‍कर में नहरों में गिर जाते हैं और वी आकार में पक्‍की बनी नहर उनके लिए काल साबित होती हैं. सितंबर 2006 में 23 हिरण एलएनपी नहर में डूबने से मरे. इन पशुओं के शिकारियों तथा वाहनों की चपेट में आना भी आम बात है. यहां तक कि जैतसर कृषि फार्म में मोरों व नीलगायों के शिकार या संदिग्‍ध परिस्थितियों में मौत अनेक बार चर्चा का विषय बन चुकी हैं. चिंकारा, खरगोश, लोमडी, सियार, काला तीतर,  पाटा गोह जैसे जीव जंतु भी धीरे धीरे कम होते जा रहे हैं. बिल्‍कुल ऐसी ही स्थिति जैसलमेर के मरू उद्यान की है. नहरी खेती के बाद बढ़ी मानवीय हलचल तथा तेल कंपनियों की गतिविधियों के चलते जैव विविधता खतरे में है.

वहीं आईयूसीएन ने अपनी रपट में मेढकों की प्रजातियों का ख़ास तौर पर ज़िक्र है और इसमें कहा गया है इसकी 6,285 प्रजातियों में से 1,895 विलुप्त होने की कगार पर हैं. उदाहरण के लिए किहांसी स्प्रे टोड एक ऐसा मेढक है जो पहले ख़तरे में था और अब विलुप्त हो चुकी प्रजातियों की श्रेणी में आ गया है. तंज़ानिया का यह मेंढक इसलिए लुप्त हुआ क्योंकि जहां इसका बसेरा होता था वहां नदी के ऊपरी हिस्से पर बांध बना दिया गया और पानी के बहाव में 90 प्रतिशत की कमी आ गई. खेती बाड़ी में इस्‍तेमाल होने वाले कीटनाशकों ने जीवों की अनेक प्रजातियों को लुप्‍त होने के कगार पर पहुंचा दिया. अब इस तरह की बातें सामने आ रही हैं कि मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों के कारण विशेषकर चिडि़या चिडी जैसे छोटे पक्षी दूर भागते हैं.

संरक्षण व सुरक्षा की जरूरत

वैज्ञानिकों का कहना है कि जैव विविधता के लिए ज़िम्मेदार ख़तरों को कम करने के लिए कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. ख़ासकर जो क्षेत्र जैव विविधता के लिए जाने जाते हैं या जहां इस तरह के जीव रहते हैं, पनपते हैं उनके संरक्षण के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठा जा रहे. उनका कहना है,“ हाल के विश्लेषणों से स्पष्ट है कि 2010 का जो लक्ष्य था इन ख़तरों को कम करने का वो पूरा नहीं हो पाएगा.’’ अखिल भारतीय जीव रक्षा बिश्‍नोई सभा के प्रदेश महामंत्री अनिल धारणियां कहते हैं कि जैव विविधता को बचाने के लिए आम लोगों को जागरुक करने के साथ साथ यह भी जरूरी है कि सरकारी स्‍तर पर गऊघाट बनाने तथा पर्याप्‍त संख्‍या में जीव रक्षकों की नियुक्ति जैसे बुनियादी कदम उठाए जाएं. पर्यावरण व प्रकृति प्रेमी मानते हैं कि सिर्फ बाघ या किसी अन्‍य प्रजाति विशेष को बचाने के लिए अभियान चलाने से अधिक कुछ हासिल नहीं होगा. इस संबंध में समाज व सरकार दोनों का मिलकर व्‍यापक प्रयास करना होगा. सबसे बड़ी बात लोगों को जागृ‍त करना है. प्रकृति का अपना एक चक्र है जिसमें जैव विविधता सबसे महत्‍वपूर्ण है और एक भी कड़ी टूटी तो उसका खामियाजा समूची मानव जाति को उठाना पड़ेगा. बेहतर यही है इस दिशा में अभी से पहल की जाए.

रेड लिस्‍ट के मायने

इंटरनेशनल यूनियन फार कंजरवेशन आफ नेचर यानी आई यू सी एन हर चौथे साल पृथ्‍वी पर उन प्रजातियों की सूची प्रकाशित करती है जो संकट में हैं. इस सूची को ‘आईयूसीएन रेड लिस्‍ट आफ थ्रेटन्‍ड स्‍पेसीज’ कहा जाता है. यह रेड लिस्ट दुनिया भर में फैले हज़ारों वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर बनती है इसलिए दुनिया में जैव विविधता पर इसे सबसे प्रमाणिक और विश्‍वसनीय माना जाता है. इस बार की रपट की नवीनतम आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर की 47,677 प्रजातियों का विशलेषण किया गया जिनमें से 17,291 प्रजातियां संकट में हैं. भारत में 687 पौधों व जीवों की कुल 687 प्रजातियों पर संकट हैं और यह दुनिया के उन शीर्ष दस देशों में  शामिल हो गया है जहां सबसे अधिक प्रजातियों का अस्तित्‍व खतरे में है. भारत में उड़ने वाली गिलहरी, एशियाई सिंह, काले हिरण, गेंडे, गंगा डाल्फिन, बर्फीले तेंदुए सहित अनेक जीवों को संकटग्रस्‍त करार दिया गया है. रपट में इस बात पर चिंता जताई गई है कि जैव विविधता के लिए 2010 के तय लक्ष्‍यों को हासिल नहीं किया जा सकेगा. आईयूसीएन रेड लिस्‍ट इकाई के प्रबंधक क्रेग हिल्‍टन टेलर का कहना है कि विश्‍व समुदाय को जैव विविधता के संकट से निपटने के लिए इस रपट का बुद्धिमता से इस्‍तेमाल करना चाहिए.