भादो के कुछ ही दिन हैं. दिल्‍ली सीकर बाइपास से गुजरते हुए सर तथा बिलोंची गांव के आसपास खूब ग्‍वार और बाजरा दिखता है. बाजरे के सिट्टे लंबे व बडे हैं. पकाव की ओर जाती फसल! नरम नरम हरियाली की चादर चारों ओर दिखती है. राजमार्ग के बीचों बीच लगे पौधों, आसपास की पहाडि़यों, घाटियों, खेतों, मेड़ों पर हरियाली के दस्‍तखत सांगोपांग नजर आते हैं.

दिल्‍ली सीकर बाइपास के आसपास बाजरे के खेत.
दिल्‍ली सीकर बाइपास के आसपास बाजरे के खेत.

थार की एक खास बात है. मेह यहां के जीवन को बहुत गहरे से भीगो देता है. चौमासे या बाद में बरसा मेह और उससे उपजी हरियाली जमीन से लेकर आसमान तक यानी पेड़ पौधों, पशुओं और इंसानों तक .. हर कहीं नजर आ जाती है. हरियाली को लेकर थार के जीव जंतुओं का अजीब सा क्रेजीनेस है. आकर्षण है. अगर मेह के बाद हरियाली है तो लोगों के चेहरों पर अलग रौनक होगी, पशुओं तक पर उसका असर होगा; प्रकृति को खैर रंगी ही होगी हरियाली में.

तो अकाळ से जूझ रहे थार के इस राजस्‍थान में इस तरह की हरियाली सचमुच सुकून देती है. उम्‍मीदों को हरा रखती है!

यही समय है जब घग्‍घर नदी की बेल्‍ट वाले इलाके में धान फल फूल रहा है. विशेषकर हनुमानगढ़ तथा गंगानगर जिलों के कुछ इलाकों में धान के खेतों में पसरी हरियाली और गीलापन दिखता है. बीकानेर की ओर बढें तो अकाळ नजर आने लगता है. विशेषकर राज कैनाल के इलाके में अबकी बार नरमा कपास तो नहीं के बराबर ही है. जो था वह पानी की कमी के कारण लगभग जल चुका है. मेह नहीं होने और नहरों में पानी की कमी के कारण यह इलाका एक बार फिर अकाळ की चपेट में है.

इससे आगे खेतों में मूंगफली की फसल नजर आती है. थार का जो पहाड़ी इलाका है वहां बाजरा व ग्‍वार. सावणी की फसलें हैं. मतीरे, तरबूज, ककड़ी, काचरी, ग्‍वार फली, भिंडी, टिंडी या टिंडसी, लोइए की सब्‍जी के दिन हैं. दिन बदल रहे हैं.. राते लंबी दिन छोटे होंगे व सर्दी बढेगी. यह अलग बात है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भादो के बावजूद अब भी जेठ आषाढ सी गर्मी है. मौसम के साथ वक्‍त भी शायद बदल गया है! अब लगता है कि सिर्फ उम्‍मीद रखने से कुछ नहीं होगा, वक्‍त आ गया है कि कुछ किया जाए ताकि आने वाली पीढियां भी मतीरे, तरबूज खा सकें!