‘..आज की दुनिया में दो ही चीजें चलती हैं पैसा या पढाई. आपके पास खूब पैसा है तो ठीक है नहीं तो आप पढाई में अव्‍वल होने चाहिएं. वरना किसी काम के नहीं. इसलिए हम चाहते हैं कि छोटे भाई खूब पढ लें.’

नारायण नाम ही बताया था उस 19..20 साल के यु‍वक ने. लूणकरणसर से बीकानेर जाते हुए बस में मुलाकात हो गई. वह गंगानगर से भीलवाड़ा जा रहा था और अपनी मंजिल बीकानेर तक ही थी. बात चल पड़ी तो बताया कि वह भीलवाड़ा के लुहारिया गांव का है. आइस‍क्रीम का काम है. देश भर में मेवाड़प्रेम और भोलेनाथ के नाम से जो रेहडियां लगी होती हैं उन पर अधिकांश लोग भीलावाड़ा या आसपास के ही होते हैं.

यह सावण के महीने की बात है. इलाके में कल ही बूंदाबांदी हुई है. नारायण की शादी छोटी उम्र में ही हो गई थी. मुकलावा (आणा) यानी गौना नहीं हुआ सात आठ साल से वह बाहर रह रहा है. अहमदाबाद से लेकर इंदौर, कोच्चि से लेकर चेन्‍नई और चंडीगढ़ से लेकर कोलकाता तक.. शायद ही ऐसा कोई बड़ा शहर हो जिसकी खाक उसने नहीं छानी हो. साल में आठ महीने बाहर रहते हैं, चार महीने घर पे.

पांच भाई और चार बहनों के परिवार वाला नारायण कहता है कि वैसे तो सबकुछ है. जमीन जायदाद, भेड़ें, दुकानें .. ठीकठाक जीवन कट रहा है. पैसे की कमी नहीं. फिर बाहर रहने की वजह पूछी तो किसी दार्शनिक के अंदाज में बोला, ‘धाप नहीं है ना, किसे धाप (संतोष) है पैसे से. जी नहीं भरता ना, इसीलिए लगे हैं.’ परिवार के ज्‍यादातर पुरूष इसी काम यानी आइसक्रीम बेचने में हैं.
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नारायण कहता है कि छोटा भाई और एक बहन पढ रही है. वे पढना चाहते हैं और हम चाहते हैं कि जितना ज्‍यादा हो पढ ले ताकि हमारी तरह धक्‍के नहीं खाने पड़ें. टैम पैसे और पढाई का ही है. दोनों ही हर किसी के पास नहीं होते. कोशिश करनी चाहिए कि कम से कम एक तो हो.

वैसे देश दुनिया में धक्‍के खाने की परिपक्‍वता उसकी बातों से नजर आती है. हमने पूछा इतनी जगह रह हो भारत में, सबसे अच्‍छी कौनसी लगती है तो बोला,’ जहां पैसा मिले वही.. पैसा मिलना चाहिए, कमाई होनी चाहिए.. जगह चाहे कोई भी हो.’ वैसे उसकी नज़र में इंदौर औरों से बेहतर है.

जिंदगी के अनुभव और उम्र का कोई संबंध नहीं है. जीवन की ठोकरें कई बार पैरों के पंजों और अंगुलियों को समय से पहले ही कठोर बना देती हैं.

लूणकरणसर, जामसर और कस्‍तूरिया एक एक कर छोटे मोटे गांव निकलते रहे… अंधेरा घिरने लगा था. बीकानेर अब ज्‍यादा दूर नहीं था. मौसम में उमस थी.