.. सत्‍य के लिए किसी से भी नहीं डरना, गुरू से भी नहीं, लोक से भी नहीं .. मंत्र से भी नहीं.

इसी कथन को हजारी प्रसाद द्विवेदी के अद्भुत कालजयी उपन्‍यास ‘बाणभट्ट की आत्‍मकथा’ का सार कहा जाए तो अतिश्‍योक्ति नहीं होगी.

बाणभट्ट की आत्मकथा उनका पहला उपन्‍यास है जो आत्मकथात्मक शैली में लिखी हुई एक विक्षण कृति है जिसमें इतिहास और कल्पना का ऐसा सुंदर समन्वय है कि वे दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं. यह हर्षकालीन भारत (सातवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) के परिवेश में लिखी गयी एक ऐतिहासिक रोमांच की सृष्टि है.

जिस पर विश्‍वास करना चाहिए, उस पर पूरा करना चाहिए, परिणाम जो हो. जिसे मानना चाहिए अंत तक मानना चाहिए. - बाणभट्ट की आत्‍मथा से एक वक्‍तव्‍य
जिस पर विश्‍वास करना चाहिए, उस पर पूरा करना चाहिए, परिणाम जो हो. जिसे मानना चाहिए अंत तक मानना चाहिए. - बाणभट्ट की आत्‍मथा से एक वक्‍तव्‍य
संस्‍कृतनिष्‍ठ और एक तरह से कलिष्‍ठ भाषा शैली का यह उपन्‍यास अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्य की गरिमा से पूर्ण है. इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूंथकर एक ऐसी कथा-भूमि निर्मित की है जो जीवन सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है. इसमें वह वाणी मुखरित है जो सामगान के समान पवित्र और अर्थपूर्ण है: ‘सत्य के लिए किसी न डरना, गुरू से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’

इसमें प्रमुख पात्र तीन हैं- बाणभट्ट, भट्टिनी तथा निपुणिका; ये तीनों पात्र अंतर्मुखी और आत्मदान की भावना से युक्त हैं. इस उपन्यास की सभी घटनाओं में व्याप्त चरित्र अगर कोई है तो वह है-निपुणिका. बाण जिस विचार को लेकर स्थाणीश्वर आया था, उसमें परिवर्तन का मुख्य कारण निपुणिका से उसका मिलन ही था और आगे चलकर जो घटनाएँ घटित होती हैं उनमें भी निपुणिका ही का प्राधान्य रहता है. इस रूप में इस उपन्यास में निपुणिका महत्व वैसा ही है जैसा किसी नायिका को होता है. वैसे निपुणिका इस उपन्यास की नायिका नहीं है.
………..
.. भट्टिनी का मुख मंडल प्रभात कालीन नवमल्लिका की भांति खिल गया. स्‍मयमान मुख की कपोल पालि विकसित हो गई. नयनकोरकों में वंकिम आनंद रेखा विद्युत की भांति खेल गई. ललाटपट्ट की वलियां विलीन हो गईं और वह अष्‍टमी के चंद्रमा की तरह मनोहर हो गया..’
(उपन्‍यास की सुंदर भाषा शैली का एक उदाहरण)

………..

बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन् कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का एक ढेला नहीं, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है. ‘अपने को निशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखनेवाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती है-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम के देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे।

डॉ.शशिभूषण सिंहल इस उपन्यास के पात्रों के बारे में लिखते हैं- ‘उपन्यास की कथा मूल रूप से प्रेम-त्रिकोण की है, किन्तु उसमें प्रवृत्त पात्रों के संयम और समर्पण-भावना के कारण कथा में असाधारण गरिमा आ गई है। निपुणिका बाण की सरलता, स्निग्धता पर अनुरक्त है और बाण भट्टिनी के पावन व्यक्तित्व का भक्त है। भट्टिनी के ह्रृदय में भी भट्ट के प्रति कोमल भाव है। तीनों पात्र अपनी भावना को व्यक्त कर, उसकी गरिमा कम नहीं करते। वे आत्मलीन और स्थिर हैं। उनका कार्यजगत्, उनका भावविभोर अन्तरालय है।’
निपुणिका जैसे एक उदास पात्र का चरित्र-चित्रण लेखक के कहीं घटनाओं के द्वारा तो तो कहीं अन्तरंग के पहलू पर अपनी ओर टिप्पणी देकर किया है। लेखक ने चरित्र की विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए पात्र के परंपरागत संस्कार, आदतें, काम-भावना आदि का सहारा लिया है। लेखक ने चरित्र पर प्रकाश डालने के लिए कुछ स्थलों पर मार्मिक घटनाओं का उल्लेख भी किया है। द्विवेदी जी के पात्र एक दूसरे के चेहरे को देखकर, मुख के भाव को पढ़कर ही एक दूसरे को समझ लेते हैं।

(राजकमल पैपरबैक्‍स, दिल्‍ली द्वारा प्रकाशित इस उपन्‍यास की उक्‍त समीक्षा के शब्‍द अलग अलग जगहों से साभार लिए गए हैं. इनके लिंक यहां दिए जा रहे हैं जहां पूरी समीक्षाएं पढ़ी जा सकती हैं.
http://www.taptilok.com/pages/details.php?detail_sl_no=361&cat_sl_no=8
http://aanchalik.blogspot.com/2008/06/blog-post_08.html
http://pustak.org/bs/home.php?bookid=7109)

(Tags: Banbhat ki atmkatha, Hajariprasad Divedi, Punarnwa, Anamdas ka potha)