राजस्‍थानी के वरिष्‍ठतम लेखकों में से एक मोहन आलोक ने हाल ही में ज़फ़रनामा का सुंदर, सार्थक और सराहनीय अनुवाद किया है. ग-गीत, डांखळा, चित मारौ दुख नै, सौ सोनेट और वनदेवी जैसी कई उपलब्धिपरक किताबें लिख चुके मोहन जी ने पिछले दिनों थोड़ी सी जमीन खरीदी और उसमें दर्जनों पेड़ लगाए. उनका कहना है कि बात सिर्फ बातों से नहीं बनेगी कुछ करना भी होगा. उनसे मुलाकात होती रहती है. इस बार छूटते ही चार सवाल उनके सामने पेल दिए. वे श्रीगंगानगर में रहते हैं.

mohan jee

क्‍या कर रहे हैं आजकल?
‘ छूटते छूटते छूटता है उनकी गली में जाना..’ , लिखने पढने वाला आदमी हूं, वही कर रहा हूं. राजस्‍थानी में नया प्रयोग रूबाइयों के रूप में किया है. 100 के करीब रूबाइयां लिखी हैं.. किताब का रूप दे रहा हूं.

राजस्‍थानी साहित्‍य की मौजूदा स्थिति?
स्थिति संतोषजनक है.. साहित्‍यकार बलिदान कर रहे हैं… खून जलाकर लिखते हैं, पेट काटकर छपवाते हैं, फिर टिकटें लगाकर भिजवाते हैं. खरीद के कोई कोई पढ़ना नहीं चाहता. राजस्‍थानी का अपना कोई पाठक वर्ग नहीं, प्राय: सभी हिंदी से ही हैं.

राजस्‍थानी साहित्‍य का भविष्‍य?
दिक्‍कत है कि राजस्‍थानी में पुरस्‍कार बहुत हैं. बड़े बड़े पुरस्‍कार हैं, अच्‍छी खासी नकदी वाले! यही कारण है कि हिंदी मूल के लेखक भी राजस्‍थानी की ओर रुख कर रहे हैं. तो हिंदी या अंग्रेजी में सोचकर लिखे राजस्‍थानी साहित्‍य में तंत नहीं होता. गहराई का सवाल ही नहीं! बड़ी चिंता यह कि स्‍थाई महत्‍व का नहीं लिखा जा रहा जिसको पढ़कर उम्‍मीद बंधे.. !

राजस्‍थानी को मान्‍यता का सवाल..?
मान्‍यता से बड़ा मुद्दा जनजुड़ाव का है. जनजुड़ाव नहीं होने पर मान्‍यता कोई मायने नहीं रखती. आम लोग भाषा के सवाल को नहीं मानते क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि काम चल रहा है. दरअसल लोगों को मान्‍यता नहीं मिलने से होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं. फिर शायद प्रशासनिक और राजनीतिक स्‍तर पर भी ज्‍यादा इच्‍छा नहीं है. शायद वहां एक सवाल यह भी है कि हिंदी बेल्‍ट से राजस्‍थान प्रदेश को निकाल दिया जाए तो बचेगा क्‍या?