कमेड़ी यानी कबूतर प्रजाति का एक ही पक्षी. राजस्‍थान में बहुतायत से मिलता है.
कमेड़ी यानी कबूतर प्रजाति का एक ही पक्षी. राजस्‍थान में बहुतायत से मिलता है.

‘चिड़ी कमेड़ी म्‍हारी भेण भाणजी, कागळो भुआ गो बेटो भाई रे..’(चि‍डि़या, कबूतरी हमारी बहिन और भानजी है, काग बुआ का बेटा भाई.. ) बचपन में होली के आसपास यह पंक्तियां बहुत बार सुनी थीं. शायद कोई गीत है. अब बेटी को सुनाने के लिए याद करने की कोशिश करता हूं लेकिन आगे की पंक्तियां बहुत गड मड हो गई हैं. उसके लिए जो मन में आता है जोड़ देता हूं. आफिस के बाहर कोयल की कूक सुन जाती है. आसपास की छतों पर लोग कबूतर पालते हैं. निजामुद्दीन, आश्रम के आसपास ढलती रात में मोर की आवाज सुनती है.

अभी नोहर जाना हुआ तो साहित्‍यकार‍ मित्र भरत ओळा के यहां रुका. उनकी पक्‍की कोठी में बाथरूम के रोशनदान के शीशा के दूसरी तरफ एक चिडि़या का घोंसला है. दरवाजा खुला हो तो बाहर के कमरे से ही चिडि़या को बैठे देखा जा सकता है. सिद्धार्थ बताता है कि यह चिड़ी हर साल यहां आती है, घोंसला बनाने. अभी उसके दो बच्‍चे भी हैं. शीशा होने के कारण चिड़ी को पास जाकर देखा जा सकता है.

घोंसला बनाने के लिए तिनके तिनके चुनती एक चिडि़या.
घोंसला बनाने के लिए तिनके तिनके चुनती एक चिडि़या.

बचपन में कच्‍चे घर की मोरी, लटाण या गाडर के बीच की जगह पर चिडि़यों का घोंसला होता था. चिड़ी के बच्‍चों को कई बार पकड़ लेते थे. या कि कहीं न कहीं गिरे मिल जाते जिन्‍हें पकड़ कर घोंसले में रख देते. मोर और टिटहरी के अंडों नहीं छूने के लिए कहा जाता है. क्‍योंकि आदमी का हाथ लगा होने के बाद ये पक्षी उन्‍हें सेते नहीं है. ऐसा माना जाता है.

अभी राजेश भाई के यहां गया तो देखा कि 11वें माले पर गिलहरी खेल रही है. नोहर में एक मंदिर में पक्षियों को चुगा, पानी डालने के लिए विशेष अहाता है. नाम भूल रहा हूं. पुराने सभी गांवों में होता है. दिल्‍ली में संसद के पास तिराहे पर या पटेल चौक जैसी अनेक जगहें हैं जहां लोग पक्षियों विशेषकर कबूतरों के लिए पानी चुगा डालते हैं. यह देखकर अच्‍छा लगता है.

बदलते वक्‍त के साथ चिड़ी कबूतर के साथ ‘भेण बेटी’ वाला संबंध भले ही नहीं रहा हो लेकिन रिश्‍ता अभी बना हुआ है.