इतिहास के अनुभवों से हम सबक नहीं लेते, इसी से इतिहास की पुनरावृत्ति होती है. – विनोबा भावे

सूरतगढ़ से बड़ोपल गांव की तरफ जाएं तो आठ किलोमीटर पर बायीं ओर निचाण में एक सड़क रंगमहल गांव की ओर जाती है. जोगियों के लिए चर्चित रहा यह ऊंचा नीचा गांव किसी आम राजस्‍थानी गांव की तरह ही दिखता है. गांव की से गुजरकर दूसरी दिशा में चले जाते हैं. वहां घग्‍घर नदी के पानी को रोकने के लिए बंधा या पाळ बनी है. उसी को लांघकर हम उस थेहड़ व जोहड़ तक पहुंचा जा सकता है जिसे कुषाण, सिंधू और गुप्‍तकालीन सभ्‍यताओं का अवशेष कहा जाता है.

रंगमहल का चर्चित और बदहाल जोहड़ ...
रंगमहल का चर्चित और बदहाल जोहड़ ...

जोहड़: गांव के उत्‍तर पश्चिम में एक बड़ा जोहड़ है. कहते हैं कि यह साधारण सा तालाब दिखने वाला यह जोहड़ लगभग दो हजार साल पुराना है और कुषाण अथवा प्रारंभिक काल की एक बावड़ी है. इस तालाब को बनाने में छह गुणा बीस ईंच की बड़ी बड़ी ईंटों का उपयोग किया गया है. लोग कहते हैं कि इस तालाब का तला पीतल का बना है. तालाब का जो घग्‍घर नदी की तरफ वाला जो हिस्‍सा है वो कच्‍चा है. बाकी तालाब में सीढि़यां बनी हैं. शिक्षक, इतिहासविद् प्रवीण भाटिया का कहना है कि तालाब का निर्माण बाकायदा नक्‍शे से किया गया और इसकी बनावट बेहतरीन है.

सिक्‍के और मूर्तिंयां
कहते हैं कि 1916-1918 में एलपी तैस्‍सीतोरी ने यहां काम किया. उन्‍होंने जो प्रतिमाएं यहां से निकालीं वे पहली शताब्‍दी के कुषाणकाल और उसके बाद के गुप्‍तकाल से संबंधित हैं. इन प्रतिमाओं में कृष्‍णलीला और दानलीला की प्रतिमाओं के साथ अजैकपाद की प्रतिमा प्रमुख है. अजैकपाद ऐसी प्रतिमा ऐसी प्रतिमा है जिसका आधा शरीर बकरे का और आधा मानव का है. उसके बाद 1950 में अमलानंद घोष ने तथा 1952-53 में स्‍वीडन के एक दल ने रंगमहल के थेहड़ों की खुदाई और खोज की. इन्‍हें भी गुप्‍तकालीन सभ्‍यताओं के अवशेष बर्तन व मूर्तियां मिलीं.

आज भी मेह आदि होने पर मूर्तियां व तांबे के सिक्‍के मिल जाते हैं.

रंगमहल के नामकरण और इसकी बसावट को लेकर अलग अलग तरह की कहानियां स्‍थानीय स्‍तर पर प्रचलित हैं. कोई इसे पूर्व शासक गंगासिंह की शिकारगाह बताता है तो किसी के अनुसार यहां रंगमहल नाम का महल था.

बदरंग रंगमहल
रंगमहल के थेहड़ व जोहड़ को उसी सभ्‍यता का अंग माना जाता है जो कालीबंगा और मोहनजोदड़ो में पली फूली और लुप्‍त हो गई. लेकिन इस धरोहर के प्रति उदासीनता देखकर वहां दुबारा जाने का शायद ही मन करे. किसी तरह की कोई व्‍यस्‍तता नहीं. जोहड़ और थेहड़ के आसपास घूमने वालों को ग्रामीण अब ज्‍यादा तरजीह नहीं देते. हम भारतीय अपने अतीत, इतिहास और एतिहासिक धरोहरों के प्रति कैसा व्‍यवहार करते हैं इसका बहुत सटीक उदाहरण रंगमहल का यह जोहड़ और थेहड़ है. सुनने में भला ही अटपटा लगे लेकिन यह सचाई है कि किसी भी अच्‍छे खासे संग्राहलय में उपलब्‍ध सामान से ज्‍यादा तो शायद इस इलाके किसी एक व्‍यक्ति के पास मिल जाए. कालीबंगा से लेकर अनूपगढ़ विशेषकर रघुनाथ पुरा की रोही या बिजयनगर तक के इलाके में इस सभ्‍यता के अवशेष मिलते रहते हैं. लोगों के पास है.

सरकारी और स्‍थानीय स्‍तर पर यह उपेक्षा दिल को कचोटने वाली है.