थार में बच्‍चों की एक कहानी या बात बहुत प्रिय और प्रचलित है. दादा दादी से लेकर नाना नानी और बुआ या मौसी … परिवार के किसी न किसी सदस्‍य से यह बात जरूर सुनी होती है. बत गुरबत के रूप में यह बात सदियों सदियों से चली आ रही है. एक छोटी सी कहानी है बच्‍चे के ननिहाल जाने और वापस आने की. रास्‍ते में आई दिक्‍कतों और उनसे बच निकलने की है. बात है ननिहाल की, ननिहाल से किसे मोह नहीं होता! यह कहानी ननिहाल यात्रा की है लेकिन अधिकतर दादी या दादा से सुनी जाती है.

थार में एक शाम को निकलता चांद .. बच्‍चों की अनेक कहानियां चांद के आस पास भी गढी गई हैं.
थार में एक शाम को निकलता चांद .. बच्‍चों की अनेक कहानियां चांद के आस पास भी गढी गई हैं.

यह कहानी मैं आपको नहीं सुना रहा. यह कहानी हमने, हमारे पुरखों ने और हमारी आने वाली एक पीढी ने अपने अपने बुजुर्गों से सुनी है. उत्‍तरी भारत विशेषकर थार में यह बच्‍चों की सबसे प्रिय और प्रचलित कहानी रही है. कहानी का किरदार झुंडिया नाम का एक बच्‍चा है जो ननिहाल जाता है. रास्‍ते के बीहड़ में उसे शेर, गीदड़ और कई जानवर मिलते हैं जो उसे शिकार करना चाहते हैं. झुंडिया उन सभी को एक ही बात कहता है, ‘ नानेरे जाइयाण दे, दही रोटियो खाइयाण दे, तगडो मोटो होइयाण दे फेर खाई’. यानी ननिहाल जाकर आने दे, वहां दही रो‍टी खाकर तगड़ो मोटा हो जाऊंगा तो आते वक्‍त खा लेना. उसकी इस बात पर एक एक कर सभी जंगली जानवर उसे जाने देते हैं.

झुंडिया ननिहाल पहुंच जाता है और वहां खूब दही चूंटिया (मक्‍खन) खाता है और मौज करता है. जब लौटने का वक्‍त आता है तो झुंडिया अपनी नानी को शेर और गीदड़ से हुई मुलाकात के बारे में बताता है. नानी उसे एक ढोलकी में बिठा कर विदा करती है. रास्‍ते में फिर वही जानवर मिलते हैं और पूछते हैं कि क्‍या उसने झुंडिए को देखा. झुंडिया ढोलकी के भीतर से ही जवाब देता है- किसका झुंडिया किसके हम.. चल मेरी ढोलकी डमाकडम.. तो इस तरह से यह सफर जारी रहता है लेकिन जंगल से निकलने से ठीक पहले एक जानवर को पता लग जाता है कि इस ढोलकी में ही झुंडिया है.

तो झुंडिए को पकड़ लिया जाता है. इसके बाद उन जंगली जानवरों के साथ झुंडिए की बातचीत और बच निकलने की कहानी है.

ननिहाल और दही चूंटिया!
जमे दूध को मथने पर जो कच्‍चा मक्‍खन निकलता है वही चूंटिया. तो थार में बच्‍चों के लिए ननिहाल हमेशा दही चूंटिया खाने की जगह रही है. हमारी नानी भी हमारे लिये बचाकर रखती थी. उनके लकडी के संदूक में चीनी, गुड़ और चूंटिया रहता था. यह अलग बात है कि वे जितना देती थीं उससे ज्‍यादा हम चुरा कर खा लेते थे. वैसे अब भी संयुक्‍त परिवारों में अधिकतर बच्‍चों को जन्‍म ननिहाल में होता है या उनका बचपन ननिहाल में बीतता है. अधिकतर बच्‍चों को घूंटी नानी, मौसी या मामी के हाथ की होती है. दही, चूंटिया खाना और मौज करना. ना मा बाबा का डर न दादा की चिंता.

प्राय: हर बच्‍चे के ननिहाल से लगाव की कुछ वजह तो है ही.

थार में झुंडिए की यह छोटी कहानी कई पीढियों से, सदियों से चली आ रही है.
थार में झुंडिए की यह छोटी कहानी कई पीढियों से, सदियों से चली आ रही है.

बात और हुंकारा!
बचपन ढाणी में बीता और ढाणी में अपनी दादी ही सबकी दादी थी. तो ज्‍येष्‍ठ आषाढ में खुले आसमान के नीचे हो या पो मा में बड़ी साळ (कमरे) के भीतर दादी के पास शाम ढलते ही बच्‍चों की टोली जमा हो जाती. जिद वही होती कहानी की. दादी से यह कहानी कई बार, अनेक बार सुनी. पूरी तो कई साल में हुई. दादी कहतीं कि बात (कहानी) कहेंगी लेकिन हुंकारा भरना होगा. यानी हर पंक्ति वाक्‍य पूरा होने पर ‘हूं’ कहना होगा ताकि उन्‍हें पता रहे कि सब जाग रहे हैं. हूं यानी हुंकार यानी हुंकारा. तो दादी कहानी शुरू करती और हम हुंकारा भरना शुरू करते. झुंडिए के ननिहाल पहुंचते पहुंचते तो सभी बच्‍चों के हुंकारे बंद हो जाते. फिर बच्‍चों को उनकी माएं ले जाती उनकी चारपाई पर. तो इस तरह से एक बात को पूरा होने में कई कई महीने लग जाते. कोई दो बच्‍चे पूरी कहानी सुन लेते तो चार रह जाते .. इसलिए वही बात दुबारा कही जाती.. ‘हूं’

झुंडिए की यह कहानी जो ननिहाल यात्रा के बारे में है, हमने दादी से सुनी. दादी हर रात बात पूरी करने के बाद जागते बच्‍चों को कहती थीं, ‘ गधे मारी लात, फूटगी परात, पूरी हुई बात .. रह गई रात’. यानी शुभ रात्रि.

‘हूं’.