रिडमलसर की रोही में धोरों में बैठे काले हिरण.
रिडमलसर की रोही में धोरों में बैठे काले हिरण.

कुछ माह पहले हम रतनपुरा की रोही में थे. निजी क्षेत्र में यह ऐसा इलाका है जहां संभवत: एशिया में सबसे अधिक हिरण पाए जाते हैं. हिरणों के झुंड के झुंड देखे जा सकते हैं. काले हिरण बड़ी संख्‍या में है. एक मोटे माटे अनुमान के अनुसार यह संख्‍या 10,000 हो सकती है. हिरणों के अलावा रोझ या नीलगाय, खरगोश, गादड़ आदि भी हैं. बदलते वक्‍त के साथ इलाके की इस जैविक विविधता पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं और जैसा कि सामाजिक कार्यकर्ता अनिल धारणियां कहते हैं कि इस दिशा में सरकारी स्‍तर पर बहुत सक्रियता और प्रभावी ढंग से कदम उठाए जाने की आवश्‍यकता है.

आखरी हिरण के शिकार का एक बड़ा कारण है इस इलाके में. आखिर 80-90 मील प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ने वाला जीवन कैसे शिकारियों के चंगुल में आ जाता है. दरअसल इसकी बहुत बड़ी वजह आखरी है. दरअसल काला हिरण हर कहीं रात व्‍य‍तीत नहीं करता. वह एक जगह नियत कर लेता है जिसे स्‍थानीय भाषा में उसकी आखरी कहते हैं. तो हिरण दिन भर भले ही कितनी दूर और कहीं भी क्‍यों न घूमे वो रात में अपनी उसी आखरी पर आता है. शिकारी इसकी पहचान कर उसके आसपास कुड़के लगा देते हैं जिनमें हिरण फंस जाता है.

आवास और समूह को लेकर हरिण भी काफी संवेदनशील और नियमबद्ध होते हैं..
आवास और समूह को लेकर हरिण भी काफी संवेदनशील और नियमबद्ध होते हैं..

।। जैविक संपदा के लिहाज से यह इलाका एशिया में सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से गिना जाता है. इसके बावजूद यहां कि दिक्‍कतों पर ध्‍यान नहीं दिया जाना अखरता है. हिरणों का शिकार या गर्मियों में उनके लिए पानी आदि की व्‍यवस्‍था बड़ी समस्‍या है।।

वैसे हिरणों के झुंड में ज्‍यादातर मादाएं होती हैं. नर तो एक ही होता है राजा के रूप में. आमतौर पर वह अपने झुंड में किसी और नर को नहीं आने देता.

हिरणों के ये झुंड इस इलाके में घूमते रहते हैं. फसलों को नुकसान के बावजूद स्‍थानीय किसान इन्‍हें नुकसान नहीं पहुंचाते. यह इलाका पीलीबंगा के लखासर से लेकर लिखमीसर, थिराजवाला, हांसलिया, हरदयालपुरा, सूरांवाली, खोतांवाली व जोड़कियां जबकि गंगानगर जिले में सरदारपुरा, घमंडिया, ढाबां झल्‍लार, रिडमलसर, एलएनपी क्षेत्र के चक 54 एलएनपी, 69 एलएनपी, 72 एलएनपी, 64 एलएनपी, 31 एमएल, उडसर, बिशनपुरा, बोरांवाली, 83 एलएनपी, बींझबायला, 2एनपी, डाबला, 7 एलसी, 22एनपी, मसानीवाला, मुकलावा, करड़वाली, 14 टीके, 9 एनके, डेलवां, भगवानसर और तामकोट तक फैला है.

लोग जागरुक हुए हैं और आमतौर पर न तो शिकार करते हैं और न ही करने देते हैं. चोटिल या घायल हुए वन्‍य जीवों के इलाज आदि की व्‍यवस्‍था भी स्‍थानीय स्‍तर पर की जाती है. अनेक खेतों में इन जीवों के पानी के लिए बनी खेळियां देखी जा सकती हैं. लेकिन कम्‍युनिटी रिजर्व और वन्‍य जीव चौकी के विस्‍तार जैसी मांगें अब भी शेष हैं.