॥ जून 2001 में, बीबीसी वर्ल्‍ड सर्विस में प्रशिक्षण के लिए लंदन जाना हुआ. लौटने पर लंदन, वहां के माहौल आदि पर तब की समझ के अनुसार एक आलेख लिखा. जो कागजों में दबा रह गया. अभी पुराने कागजों में मिला. सोचा ब्‍लाग पर छाप देते हैं. हालांकि अब दुनिया काफी बदल गई है फिर भी इसे लंदन पर छोटे से गांव के एक उत्‍साहित युवा की प्रतिक्रिया मानकर तो पढा जा सकता है.॥

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सरद मुल्‍कों के सूरज !

लंदन जाने के लिए जब दिल्‍ली के अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे में घुसा, वह उतरते जेठ की तपती रात थी. उतरता उत्‍तरायण काल. तनाव हर कहीं था. अपने नक्षत्रालंकारों के साथ चमकती- दमकती निशा भी अरूण की दिन भर की तपस से बच नहीं पाई थी. आवेश अपने भीतर भी था… बैलगाड़ी में बैठते- बैठते पहली बार चीलगाड़ी में बैठने का! तमाम औपचारिकताएं, वातानुकूलित रास्‍ते और लगभग नौ घंटे लगातार हवा में सफर. हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरा तो तापमान था 15 डिग्री सेल्सियस. बादल छाये थे, हवा चल रही थी. नागेंद्र ने बताया कि लंदन के मौसम का कोई विश्‍वास नहीं. यानी कब मेह बरसने लगे और कब धूप.. पता नहीं चलता. इसलिए बचाव में ही बचत है. अगले बीसेक दिन इस शहर के मौसम को देखकर मान लिया कि लंदन में किसी पर भी विश्‍वास कर लो मौसम पर कतई नहीं. बेईमानी और शरारत तो मानों उसकी रग- रग में बसी है. यह अच्‍छा भी लगता है.

लंदन की बरसात के तो क्‍या कहने. टैक्‍सी चालक टाइना कहती हैं कि यहां प्राय: ‘ जेंटलमेन रेन’ होती है यानी झमाझम दो – पांच मिनट बरसी और कहानी खत्‍म. अगर इससे ज्‍यादा समय तक और तेजी से बरसे तो वह कम से कम लंदन की चिरपरिचित ‘जेंटलमेन रेन’ तो नहीं ही होगी. बरसने का कोई समय नहीं, जब जी चाहा बरस लिए. बच्‍चे की तरह, जब जी मचला हंस लिए.. रो लिए ! यही कारण है कि लंदन में छाता रखना संस्‍कृति का अंग बन गया है. घर से निकलने वालों के हाथ या थैलों में छोटे-छोटे छाते अवश्‍य मिल जाएंगे. मौसम की इसी अनिश्चितता के कारण लोग सुबह घरों से निकलने से पहले टेलीविजन या रेडियो पर मौसम की भविष्‍यवाणी सुनने से नहीं चूकते. वे आमतौर पर उसी के अनुसार तैयार कर जाते हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि वहां मौसमी अनुमान सटीक होते हैं.

गोकि मई से जुलाई तक का समय लंदन में गर्मियों का होता है. यह सबसे अच्‍छा मौसम माना जाता है और पारा शायद ही कभी 20 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ता हो. गर्मी के मौसम में सूरज देखने को तरस जाना ? सूरज भी मर्जी का मालिक सा लगता है और सूर्यभानु गुप्‍त की पंक्तियां याद आती हैं.. हम तो सूरज हैं सरद मुल्‍कों के, मूड आता है तब निकलते हैं. यहां जब कभी सूरज निकलता है तो बड़ा अजीब सा लगता है. रूपा के शब्‍दों में- यूं लगता है गोया सूरज सरक कर कुछ करीब आ गया हो. सूरज का यह मूडी स्‍वभाव बाहर से यहां आने वालों का मूड खराब किए रखता है. इन दिनों लंदन में रात दसके बजे तक रोशनी रहती है. सुबह चार- पांच बजे यही रोशनी फिर दरवाजों खिड़कियों पर दस्‍तक दे देती है. धूप हमेशा जाड़े की सी रहती है. सुहाने वाली. नरम गरम ऊनी शाल की तरह हर वक्‍त तन मन से लिपटी रहती है !

लंदन में हरियाली सांगोपांग है. शहर से बाहर निकलें तो लंबे-चौड़े खेत मन मोहते हैं. कभी खूब रही तो कभी संदली होती निर्बाध हरियाली. कितना अच्‍छा लगता है कि कई किलोमीटर तक हरियाली ही हरियाली हो. कोई बाधा नहीं, न मशीनों की न किसी और की. ठीक वैसे ही जैसे थार में पसरी बालुई रेत. सेम मिलर भारत व इंग्‍लैंड में इसे भी एक फर्क मानते हैं. वे कहते हैं कि चूंकि यहां खेती बाड़ी का अधिकतर काम मशीनों से होता है तो हम मीलों मील फैले खेत देख सकते हैं सिर्फ और सिर्फ हरियाली जो मानों आंखों में समाती जाती है.

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लंदन में लोगों के लिए ‘ धूल फांकना’ मुहावरे का शायद ही कोई मतलब हो. शहर में माटी दिखती ही नहीं. मरूभूमि में माटी ओढते- बिछाते, खाते आए हम जैसे लोगों के लिए यह काफी कोफ्त देने वाला पहलू है. कैसा शहर है कि माटी तक नहीं दिखती. इसी कारण सफेद निर्मल चांदनी रात में बालू पर चलने आ आनंद तो यहां नहीं लिया जा सकता हां, चिकनी, सपाट व सियाह काली सड़कों पर बूटों की ठक ठक सुना या ऐसा करते हुए चलना भी गूंगे का गुड़ ही तो है !

वैसे लंदन क्रियाशील, उम्‍दा व जागृत शहर है. कहीं भी कभी भी नहीं लगता कि वक्‍त ठहर गया हो. हर शख्‍स गतिमान तथा अपने काम में व्‍यस्‍त दिखता है. काम के प्रति अद्भुत समर्पण.. बूटों की ठक .. ठक या मोबाइल घंटियों की पीं पां पीं ..ही यहां पसरे सन्‍नाटे को तोड़ती है. यह काम के प्रति निष्‍ठा और अपने काम से काम वाली अवधारणा का शहर है. लेणी एक न देणी दो. गलियां, बाजार, स्‍टेशन व ट्यूब्‍स (मेट्रो) .. यूं लगता है मानों आदमियों का नहीं बुतों का शहर हो. यहां आकर तन्‍हाई तो मर जाती है लेकिन कोई सुर या आलाप सुनाई नहीं पड़ता. सन्‍नाटे की इस नयी प्रकृति को इस शहर में देखा और महसूस किया जा सकता है. हां, हर दिन ऐसा नहीं होता. खासकर शुक्रवार की ढलती शाम से लेकर रविवार की रात तक. हर सप्‍ताह के ये दो दिन जश्‍न के होते हैं. मस्‍ती का आलम रहता है इस दौरान. रेस्‍त्राओं, बार में जगह नहीं मिलती. हर तरफ युवाओं की भीड़ दिखती है एक- दूसरे को थामे, आलिंगन किए. यह शहर भले ही कितना ही उच्‍छृंखल क्‍यों न हो यहां के युवा शर्मीले से लगे विशेषकर लड़कियां..!

लंदन में लोगों की एक खास बात और जो दिखती है वह है- पढाई के प्रति मोह. बस हो या ट्यूब, स्‍टेशन हो या कहीं और हर कोई किताबों- अखबारों में खोया दिखता है. जारा गासन इसे बोरियत भरा मानती हैं. वे कहती हैं,’ बहुत बुरा लगता है जब आप सुबह सवेरे अच्‍छे मूड के साथ घर से निकलें और बस या ट्यूब में देखें कि हर कोई सपाट चेहरे के साथ किताब, अखबार में खोया है. फिर भी यहां की एक खासियत तो है ही.’ यहां सफर करने वाले हर व्‍यक्ति के पास एक छोटा मोटा थैला रहता है जिसमें छाता, संगीत सुनने का कोई साधन तथा अन्‍य सामान के साथ अखबार या किताब तो अवश्‍य ही होती है. दो-दो सौ पृष्‍ठों के दैनिक टेब्‍लायड बिकते हैं यहां. इसे छपे हुए शब्‍दों की महत्‍ता के रूप में भी देखा जा सकता है, उस शहर में जहां कंप्‍यूटर तथा इंटरनेट जैसी तमाम आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं.

लंदन सीढि़यों तथा लिफ्टों का शहर है. हर भवन में या कि हर छोटी सी यात्रा में सीढि़यां चढनी उतरनी पड़ती हैं. अगर आप अपने कदमताल के प्रति लापरवाह हैं तो कहीं भी मात खा सकते हैं. लंदन की जनसंख्‍या लगभग सत्‍तर लाख है. बीस साल पहले भी इतनी ही बताई जाती है. और 75 प्रतिशत से अधिक लोग प्रतिदिन यात्रा करते हैं. इसके बावजूद कहीं अव्‍यवस्‍था नहीं दिखती. अपनी तमाम व्‍यवस्‍तताओं और जल्‍दबाजी के बावजूद लोग इंतजार करने का धैर्य रखते हैं. अपने यहां अगर दस बीस आदमी ही इकट्ठे हो जाएं तो सब होच पोच कर दें. बीस साल से लंदन में रह रहे शिवकांत कहते हैं कि दरअसल व्‍यवस्‍था या धैर्य, विश्‍वास से आता है. अगर आपको विश्‍वास हो कि इस बस के ठीक पांच मिनट बाद और बस है तो आप इंतजार कर लेंगे. अगर व्‍यवस्‍था में आपका यह विश्‍वास नहीं है तो आप उसी बस में सवार होने की कोशिश करेंगे. यही भावना अव्‍यवस्‍था की ओर ले जाती है.

हर शहर की तरह लंदन के भी कई चेहरे हैं. एक रात देखा कि दो महिलाएं एक कार को धक्‍का लगाकर स्‍टार्ट करने की कोशिश कर रही हैं. शनिवार की शाम शराब पिए एक युवक को बेजवाटर रोड पर एक बार के सामने लोटते देखा. किसी विद्यालीय परीक्षा का पर्चा आऊट होने का मामला इन्‍हीं दिनों चर्चा में रहा. इस पर एक समाचार पत्र में कार्टून छपा .. एक छात्र पैसे लेकर खड़ा है और एक व्‍यक्ति से कह रहा है- ‘ नहीं श्रीमान, मुझे प्रश्‍न पत्र नहीं उत्‍तरपुस्तिका चाहिए. प्रश्‍नपत्र तो मेरे पास पहले से ही है.’

बुश हाऊस लंदन में
बुश हाऊस लंदन में

इंग्‍लैंड का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां महिलाओं ने सशक्‍त उपस्थिति दर्ज नहीं कराई हो. संचार माध्‍यमों में भी उनकी संख्‍या हैरान करने वाली है. ब्रिटिश ब्राड‍कास्टिंग कारपोरेशन की ही बात करें. अनेक क्षेत्रीय समाचार सेवाओं की प्रमुख महिलाएं हैं. चाहे वह एशियन नेटवर्क की विजय शर्मा हों, अलबेनियन सेवा की जूलिया गूगा, हंग‍रियन सेवा की काल विटाल या हिंदी सेवा की अचला शर्मा. संपादन के अलावा प्रबंधन व तकनीकी क्षेत्र में भी महिलाओं की तूती बोलती है. भारत से आने वाले के लिए यह एक विस्‍यमकारी तथ्‍य हो सकता है. बीबीसी के एक वरिष्‍ठ संपादक स्‍टीव टिथेरिंगटन ने इस बारे में कहा कि इंग्‍लैंड की संस्‍कृति में यह कुछ नया नहीं है. शुक्र करो कि यह संख्‍या 50 प्रतिशत से थोड़ी कम ही है.

लंदन दुनिया के सबसे महंगे शहरों में से एक है. भारतीय मुद्रा में बदलकर देखें तो होटल में आम भोजन की थाली की कीमत 400 रुपये से अधिक पड़ती है.

हर शहर की अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और पहचान होती है. अपनी तासीर होती है. लंदन तो एतिहासिक शहर है. कोई भी इस गतिवान, जिंदादिल व क्रियाशील शहर में आनंद उठा सकता है. यहां अचला शर्मा की एक बात याद आती है- हम अपनी सीमाएं तय करें, उन्‍हें दूसरों पर थोपे नहीं!

(जून 2001 के बाद से टेम्‍स नदी में बहुत पानी बह चुका है. लंदन से लेकर दिल्‍ली तक दुनिया काफी बदल चुकी है. यह आलेख लिखा गया तब न तो भारत में निजी टेलीविजन चैनलों और एफएम स्‍टेशनों ने इतना कादा कीचड़ किया था और न ही विमानन सेवाएं इतनी सस्‍ती और सुरक्षा औपचारिकताएं इतनी कड़ीं थीं. आलेख ज्‍यों का त्‍यों हैं बस छोटा कर दिया है.)