कीकर-पातड़ी की चकरी

हरियाणा रोडवेज की एक बस है जो सुबह साढेक आठ बजे भादरा होते हुए नोहर पहुंचती है. सुबह सुबह बस से पीलीबंगा या सूरतगढ़ आने का यह सबसे बढिया साधन है. अच्‍छी बस और चालक खींचते हुए चलता है.

यह पिछले महीने की बात है. चैत उतर रहा था और गर्मी शुरू हो गई. कई मित्रों ने सुझाव दिया कि अगर आराम से और जल्‍दी जाना है तो इसी बस से निकल जाओ. हम पहले ही जिक्र कर चुके हैं कि नोहर में सेठों की मदद से बहुत काम हुआ है. इसका एक नमूना यहां का बस अड्डा भी है जो कभी इलाके का सबसे अच्‍छा और बड़ा अड्डा हुआ करता था.

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नोहर से बस छूटती है तो रेगिस्‍तान फिर दिखने लगता है. नोहर के बाद टोपरियां, भगवान, थालड़का, चाइयां, और रावतसर … कई गांव चक आते जाते हैं. खेतों में काम का टैम है. कई जगह कणक कट रही है, सरसों निकाली जा रही है या जौ और चने की मंडलियां लग रही हैं. एक जगह देखा कि दो लोग बैंगी से मंडली कर रहे हैं. शायद चने की. यह पहली बार देखा. सुना था कि पुराने समय में लोग मांची, खारे या बैंगी से मंडली बनाते थे. अब थब्बियों या पांड या भारिया यानी गट्ठर से फसल इकट्ठी की जाती है. यानी उसे खेत से खलिहान तक लाते हैं. बैंगी का हमारी तरफ ईंटें निकालते समय गारा ढोने के लिए करते रहे हैं.

तो बात यही कि इस जमाने में भी बैंगी का इस तरह इस्‍तेमाल देख हैरानी सी हुई. खैर रावतसर से ठीक पहले सैम पसरी है. यानी भूतल पर पसर गया भूमिगत पानी. जिससे जमीन दलदल में बदल गई और हजारों हजारों एकड़ जमीन नकारा हो गई. इस इलाके में सैम एक बड़ी समस्‍या है. तमाम वादों, योजनाओं और प्रयासों के बावजूद इस दिशा में कोई प्रभावी परिणाम सामने नहीं आ सका है.

रावतसर से पहले तक खेतों और सड़क के आसपास खेजड़ी ही खेजड़ी के दरख्‍त दिखते हैं. लेकिन रावतसर के ठीक बाद कीकर, टालियां दिखने लगती हैं. जमीन भी बारानी से नहरी हो जाती है. हो भी क्‍यों न आगे आधुनिक भगीरथी ‘ राज कैनाल ‘ है जिसे अब इंदिरागांधी नहर कहते हैं.

पातड़ी से लकदक कीकर
पातड़ी से लकदक कीकर

लक्‍खूवाली हैड से बस बायीं ओर मुड़ जाती है. यानी यह हनुमानगढ़ नही जाकर वाया पीलीबंगा हो जाती है. चौहिलांवाली, लाधू वाला पंडिता वाली जैसे अनेक गांव इसी सड़क पर आते हैं.

रावतसर के तुरंत बाद पेड़ पौधों के साथ मानों खेतों का रंग भी बदल जाता है. यह सिंचित क्षेत्र है. यहां कई जगह पेमली बेर के बाग से दिखते हैं. बीघे दो दो बीघे में पेमली बेरियां हैं. कीकर की पातडि़यां लग गई हैं. वैसे कीकर की पातड़ी बकरी और ऊंट बडे़ चाव से खाते हैं. इसका आचार भी बनता है. अपन बचपन में पातड़ी, सूळ (कांटा) और सरकंडे या सरड़े की मदद से चक्‍करी बनाते थे. हवा के सामने भागते तो यह चक्‍करी तेजी से आवाज करती घूमती जैसे किसी वाहन के आगे लगा पंखा.

यह सड़क पीलीबंगा जाकर निकलती है.