फ्रांस के दरख्‍त

थार अपने आप में विविधता का पिटारा है. यह विविधता यहां की जलवायु से लेकर आम जीवन और प्राकृतिक संपदा में भी दिखती है. अनेक तरह की पेड़, पौधे, जडी बूटियां हैं. बेहद समृद्ध, आज भी आम लोग हारी बीमारी में इनका इस्‍तेमाल करते हैं. एक तय फार्मूला है. पेट दर्द से लेकर हाड मजबूत करने वाली बूटियां यहां मिलती हैं.

ऐसा ही एक दरख्‍त है फ्रांस का. वैसे सही शब्‍दों में यह फराश का दरख्‍त है. हम स्‍थानीय लोग इसे फ्रांस ही कहते हैं. कहा जाता है कि यह दरख्‍त उन इलाकों में है जो कभी किसी न किसी नदी का बहाव क्षेत्र रहा या है. यही कारण है कि नोहर, भादरा से लेकर कालीबंगा, रंगमहल, अनूपगढ़, घड़साना एक बडे इलाके में यह दिखता है.

फराश की पत्तियों से गुजरती हवा बहुत तेज सायं सायं करती है.
फराश की पत्तियों से गुजरती हवा बहुत तेज सायं सायं करती है.

ऐतिहासिक रूप से ये इलाका दृषद्वती, सरस्‍वती, नाइवाल या हाकड़ा जैसी नदियों का बहाव क्षेत्र रहा है. अब यह लगभग सूख गया है. नदियां लुप्‍त हो गई हैं. एक लंबे समय तक रेगिस्‍तान रहने के बाद सिंचाई व्‍यवस्‍था शुरू हुई. ऐसे इलाके में फराश का दरख्‍त दिखता है. फराश की एक और विशेषता है कि यह शुष्‍क भूभाग में किसी भी अन्‍य पेड़ पौधे की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ता है। इसके अलावा इसकी गर्मी सहने की क्षमता भी थार के लोगों की तरह अनूठी है। यह भीषणतम गर्मी में भी विकास करता है।

फराश की पत्तियों की विशेषता होती है। वे विद्यालयों में लगने वाले मोरपंखी (सरस्‍वती) के पेड़ की तरह कटी फटी और बारीक बारीक होती हैं। थोड़ी सी भी हवा चलने पर उनमें तेज आवाज होती है – सायं सायं। फराश की टहनियां थोड़ी भी हवा चलने पर पूरी तरह से हिलती हैं और तेज आवाज होती है। अगर कुछ पेड़ एक साथ हों तो रात तो क्‍या अच्‍छा भला आदमी दिन में भी डर जाए।

फ्रांस, सुनने बोलने में लगता है कि इसका फ्रांस देश से कुछ लेना देना होगा. ऐसा नहीं है. फराश अपभ्रंश होकर फ्रांस हो गया, ऐसा ही सयाने लोग कहते हैं.
(‘थार की ढाणी’ के एक आलेख पर आधारित)