ये कैसा मौसम है दोस्‍तो!

    …. चांद पूरा है. पूरा का पूरा. चमकता हुआ. तड़के पौने पांच बजे छत पर जाकर एक बार फिर देखा. छत नम है. थोड़ी हवा भी चल रही है. उतरता चैत. चैत की ये आखिरी रात है. वैशाख का दिन उग रहा है. हर दिन का सूरज नया होता है. उसकी रोशनी नई होती है और उम्‍मीदें भीं… (नौ-दस
    अप्रैल,2009 तड़के पौने पांच बजे)

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    दिल्ली से हिसार फिर नोहर. सूरतगढ़ और आते वक्‍त पंजाब से. उत्‍तर भारत में यह काम का टैम, वक्‍त है. चैत उतर रहा है. खेती के लिहाज से उत्‍तर भारत में सबसे व्‍यस्‍त समय. कणक, जौ, चना व सरसों .. सारी फसलें एक साथ तैयार हैं. सांस लेने की फुरसत नहीं है. ऊपर से मौसम ने फच्‍चर फंसा दी है. दिल्‍ली की बात करें तो कल बुधवार की सुबह से ही बादलवाही और रिमझिम होती रही. चैत या चैत्र के महीने में आमतौर पर ऐसा नहीं होता है. चैत चिड़पड़ो माड़ो. खेती के लिहाज से तो अच्‍छी धूप होनी चाहिए. लेकिन राजस्‍थान से लेकर पंजाब, हरियाणा, उत्‍तरप्रदेश की बेल्‍ट में मेह, ओलावृष्टि हो रही है. राजस्‍थान के कई इलाकों में ओलावृष्टि ने फसलों को तबाह कर दिया है.

    पंजाब सरकार का कहना है कि जलंधर, मानसा, लुधियाना जैसे कई इलाकों में तो आधी से अधिक फसल बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टि से प्रभावित हुई. इसका असर गेहूं की खरीद पर पड़ सकता है. दिल्‍ली में मौसम विभाग का ड्यूटी आफिसर कहता है ‘ वेस्‍टर्न डिस्‍टरबेंस है साहेब, होता ही रहता है. शुक्र है इस बार बाद में हो रहा है पहले तो मार्च में हो जाता था.’ फोन रख देता हूं. उस भले मानस को कौन समझाए कि पश्चिमी विक्षोभ के एक महीने पीछे चले जाने से उत्‍तर भारत के हजारों लाखों किसानों की आजीविका पर क्‍या असर होगा. एक महीने पहले बारिश होती तो ठीक थी अब तो प्रलय है. किसानों की उम्‍मीदों और छह महीने की मेहनत का सत्‍यानाश है.

    बुधवार को दिल्‍ली के आसमान में छाए बादल..
    बुधवार को दिल्‍ली के आसमान में छाए बादल..

    उतरता चैत और वैशाख का महीना उत्‍तर भारत में हाड़ी (रबी) फसल की कटाई का है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान राज्‍यों में इस समय गेहूँ,जौ,चने,सरसों की कटाई या उसे निकालने का काम जोर शोर से चल रहा है. गेहूं हो या चना और जौ या खेत खलिहानों में पड़ी सरसों .. अच्छी धूप और कम नमी वाला मौसम इस समय जरूरी है। यह अच्छी फसल तथा उसे खेतों से सुरक्षित मंडियों या घरों तक पहुँचाने के लिए जरूरी है।

    लेकिन पिछले कुछ दिनों से मौसम काफी बदला हुआ है। बादलवाही़, बूँदा बाँदी तो आम हो गई है। ओलावृष्टि भी हो रही है. काम एक साथ सिर पर है इसलिए इसे एक दो दिन में निपटाया नहीं जा सकता. महीना भर तो लग ही जाएगा. मौसम सच में साथ नहीं दे रहा. बेमौसमी बारिश सिर्फ फसलों को नहीं भिगोएगी वह किसान की छह महीने की हाड़तोड़ मेहनत और उम्‍मीदों पर भी पानी फेर देगी. मौसम देवता और मौसम विभाग को किसान के बारे में सोचना चाहिए.