तड़के साढे़ चार बजे नोहर का उनींदा सा रेलवे स्‍टेशन.
तड़के साढे़ चार बजे नोहर का उनींदा सा रेलवे स्‍टेशन.
  • नोहर : बंद हवेलियों का खुला नगर

सुबह के चारेक बज रहे थे जब निजी बस ने नोहर के बिहाणी चौक पर उतारा. राजस्‍थान के एक सिरे पर बसा यह ऐतिहासिक कस्‍बा, एक गांव की तरह उनींदा था. चौक पर चाय और बस वाले की दुकान ही खुली थी. ज्‍यादा लोग भी नहीं थे. बस के ज्‍यादातर लोग उतर गए और अपनी अपनी राह पकड़ ली. पेड़ के नीचे चबूतरे पर रखे मटके से पानी लेकर मुंह धोया और चाय पी. पांच रुपये में एक कप.

अंधेरों के उजाले, रोशनी के अंधेरों से अलग होते हैं. यही सोचकर मुहं अंधेरे ही थोड़ा घूमने का मानस बना. ढाबे वाले भाई से पूछ यूं ही होटल या धर्मशाला की तलाश में निकल पडे़. नोहर की गलियां और माहौल ठेठ ग्रामीण. वही गांवों सा सन्‍नाटा और इतर तितर बैठे डांगर. साढे़ चार बजे के बाद भी नोहर जागा नहीं था.बिहाणी चौक से जीटी रोड की ओर जाते समय बायीं ओर मुड़ गए और घूमते घुमाते पहुंच गए धान मंडी. धानमंडी में एक ही दुकान पर गेहूं की ढेरी लगी थी. नई फसल की. वहां अधजगे से युवक से बस अड्डे का रास्‍ता पूछा.

नोहर में या यूं कहें वहां की धानमंडी में गधे बहुत हैं.

उसने जैसा बताया वैसा करते हुए रेलवे स्‍टेशन पहुंच गए. जीटी रोड के बायीं ओर रेलवे स्‍टेशन है छोटा सा. उस वक्‍त वहां दो चार लोग बैठे थे. जैसे ही अंधर घुसे गार्ड ने घंटी बजाई, गाड़ी आने की पूर्व सूचना वाली. साढ़े चार बजे यहां से एक गाड़ी है जो जयपुर से आती है. पैसेंजर. कोई पांचेक लोग होंगे उस वक्‍त स्‍टेशन पर. स्‍टेशन के बाहर काफी दुकानें खुलीं थीं. जयपुर, दिल्‍ली, बीकानेर से, जाने वाली बसें आ रही थीं. एक जीप वाला रावतसर, रावतसर की आवाज दे रहा था.
स्‍टेशन से बाहर निकलते ही सीधे मुहं की तरफ सड़क जाती है. उस पर चल पड़े. आगे चलकर देखा तो बिहाणी चौक था. यानी पौने घंटे में घूम फिरकर वहीं आ गए जहां से चले थे.

बंद पड़ी और जर्जर होती हवेलियां

एक बंद पड़ी हवेली.
एक बंद पड़ी हवेली.

नोहर अपने पुरानी पुरानी हवेलियों के लिए भी जाना जाता है. ये ह‍वेलियां उन सेठों (बणियों) की हैं जो अर्सा पहले कलकत्‍ता, मद्रास, हैदराबाद या अन्‍य स्‍थानों पर चले गए. पीढियां गुजर गईं. इन हवेलियों में से कुछ के ही वारिस अब यहां आते हैं. इनकी देखभाल करते हैं. बाकी सब ऐसे ही सुनसान पड़ी हैं, जर्जर होती, ढहती. इन हवेलियों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि संपन्‍नता यहां बहुत पहले से ही है. जैसे कि अब का सेक्‍टर पांच.

निजी भागीदारी से विकास
नोहर को शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य जैसी जनोपयोगी सेवाओं के लिए क्षेत्र में अव्‍वल माना जाता है. इसका एक बड़ा कारण बाहर गए सेठ परिवारों का यहां के विकास में योगदान भी है. थिरानी, पेड़ीवाल, बिहाणी आदि परिवारों ने विभिन्‍न कामों के लिए दिल खोल कर खर्च किया है. वह चाहे सड़कों का निर्माण हो या विद्यालयों का. यह दिखता है. इन परिवारों का जमीन से जुड़े रहने का यह अनूठा प्रयास है जिसे किसी तरह के परिणाम की अपेक्षा के बिना किया गया है. इस योगदान ने नोहर को कई मायनों में अलग स्‍थापित कर दिया.

लाखड़ती जूती: टिकाऊ और मुलायम

एक दुकान में जूतियां.
एक दुकान में जूतियां.

नोहर की जूतियां भी काफी चर्चित हैं. इनमें से एक है लाखड़ती जूती. लाख जैसे रंग की यह जूती बकरे की खाल से बनती है. जोगीआसन, नोहर के चानणमल बताते हैं कि टिकाऊपन, कोमलता तथा वजन में हल्‍का होना इस जूती की खासियत है. राजस्‍थान से बाहर भी इन जूतियों की खूब मांग है. लोग आर्डर देकर ये जूतियां मंगवाते हैं. विशेषकर राजस्‍थानी उत्‍पादों की जानकारी और पहचान रखने वाले लोग. चानणमल की दुकान में एक फोटो लगी है जिसमें वे प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत को जूती पहना रहे हैं.

खुला खुला सा नोहर
पुरानी आबादी को छोड़ दें तो नोहर काफी खुला खुला है. वरिष्‍ठ साहित्‍यकार भरत ओळा के शब्‍दों में गांव का गांव, शहर का शहर. घिच पिच नहीं है. स्‍पेस है हर कहीं जो लोगों के दिलों में भी है. काफी मिलनसार और बाहें पसारे स्‍वागत करने वाला. गलियां खुली हैं और घर भी गांवों की तरह दूर दूर हैं. अभी तक शहरी ‘संकीर्णता’ न तो इस नगर में आई है और न ही लोगों की मानसिकता में.

वैसे भी नोहर की भूमि ऐतिहासिक और प्राचीन है. नोहर भी उसी बेल्‍ट में आता है जो नाथ संप्रदाय की बहुलता के लिए विख्‍यात है. गोगामेड़ी हो या गोरखाणा, नाथों के अनेक मठ इलाके में हैं.