रेत का समंदर और तृष्‍णाओं के बीहड़

  • थार में प्‍यास से किसी बंजारे या यात्री के दम तोड़ने की कहानियां बचपन में कहीं न कहीं सुनने को मिल जाती थीं. सुनते थे कि इनकी रूहें आज भी वहीं भटकती हैं और रात में पानी-पानी की आवाज आती है. अपने आसपास के ही कई धोरों या रास्‍तों पर इन घटनाओं के होने की बातें की जाती. यह बात अलग है कि धीरे धीरे इन कहानियों पर वक्‍त की परत जमा होती गई. पिछली गर्मियों में खारबारा (छत्‍तरगढ़) के सरंपच ने महाजन इलाके में इसी तरह की घटना का जिक्र किया. किसी के प्‍यास से मरने का.

    वैसे यह सही है कि थार का रेतीला समंदर कभी कभी बहुत भयानक व दुरूह हो जाता है. यहां जेठ आषाढ़ की गर्मियों में आंधी और पो मा की सर्दी जीवन को झिंझोड़ कर रख देती है. गर्मी को अधिक खतरनाक प्‍यास और आंधी में भटकने के डर के कारण माना जाता है. पानी की कमी और रेत की अधिकता। विकट थार, जो पता नहीं एक आंधी में क्‍या रूप ले ले। रूखे से पेड़ और मुरझाती सी कंटीली झाडियां। सीधे साधे शब्‍दों में मानवीय जिजीविषा की परीक्षा लेता है रेगिस्‍तान ! बात पानी की ही है. थार के बच्‍चे पानी और आदमी की कद्र करना शायद घूंटी के साथ ही सीख जाते हैं क्‍योंकि वहां पानी और आदमी दोनों की कमी रहती है.

    राजस्‍थान के गंगानगर व हनुमानगढ़ जिले की हमारी पीढ़ी को ‘प्‍यास से मर जाना’ अटपटा सा लगता रहा है. लगे भी क्‍यों न, हमारे जिलों में विशेष रूप से आजादी से पहले ही नहरें आ गईं. दुनिया की सबसे बड़ी नहर परियोजनाओं में से एक इंदिरागांधी नहर परियोजना के साथ साथ दो और नहर परियोजनाएं यहां है. हमारी उम्र की पीढ़ी के लिए पानी इफरात में रहा और बचपन में कभी नहीं लगा कि प्‍यास से भी लोग मर सकते हैं.

    ढलती शाम में कैमरे के सामने से गुजरतीं एक बुजुर्ग राजस्‍थानी महिला
    ढलती शाम में कैमरे के सामने से गुजरतीं एक बुजुर्ग राजस्‍थानी महिला

    लेकिन धीरे धीरे पता चलता है कि थार में रेत और पानी का कितना संबंध है. पानी के लिए थार में जीवन भटकता रहा है. पानी कभी यहां पलायन का मुख्‍य कारण रहा है तो मानवीय बसावट का भी. आबादियां वहीं बसीं जहां पानी था. पानी की कमी के कारण ही उसे घी की तरह बरतने का सहज भाव जीवन में आ गया. यह अलग बात है कि बदलते वक्‍त के साथ बहुत कुछ बदल गया. जैसे कि इन दो जिलों में. कभी पानी का संकट था, बाद में पानी की अधिकता परेशानी बन गई और सेम या वाटर लागिंग जैसी नयी परेशानियां सामने आईं. जैसे जैसे अधिक रकबा कमांड हुआ पानी कम होता गया. नहरों के वरीयता क्रम में गडबड़ी की बाते हुईं. तीनेक साल पहले सिंचाई पानी की मांग को लेकर घड़साना रावला क्षेत्र में किसानों का आंदोलन हुआ जिसमें आधा दर्जन भर किसान बेमौत मारे गए.

    थार का सबसे उपजाऊ माना जाने वाला इलाका एक बार फिर पानी की कमी, असमान वितरण आदि के कारण संकट के मुहाने पर है. इतिहास का पहिया वहीं लेकर आ गया. प्‍यास से मरने, पानी की अधिकता से तबाह होने और फिर पानी की मांग को लेकर मरने तक. कई बार लगता है कि थार के समंदर में हमने वक्‍त के साथ तृष्‍णाओं के बीहड़ उगा लिए हैं. पानी कम हो रहा है, मांग बढ़ रही है और इसकी कद्र का जो भाव हमारे पास था वह गायब हो गया है.

    व्‍यक्तिगत सी बात है लेकिन यह सही है कि थार के बच्‍चे पानी और आदमी की कद्र करना शायद बचपन से ही घूंटी के साथ सीख जाते हैं. कई घटनाएं होती हैं. याद है एक बार दादी के साथ घर लौट रहा था. बस से उतरने के बाद हमारी ढाणी कोई तीनेक किलोमीटर थी. जेठ की तपती दुपहरी रेगिस्‍तान में, जमीन मानों भट्टी बन जाती है. सफर करके आ रहे थे, प्‍यास लगी थी. बस अड्डे के पास नहर में थोड़ा पानी चल रहा था. दादी ने किसी तरह पी लिया लेकिन मैं कैसे पीता. उन्‍होंने अपने हाथ से पिलाने की कोशिश की. तीन चार साल के बच्‍चे के मुहं तक आते आते हथेली में कुछ नहीं रहता. दादी को कुछ नहीं सूझा तो उन्‍होंने अपनी एक जूती उतारी, पानी भरा और पिला दिया. बरसों बाद आज भी उस नहर पर से गुजरते हुए यह घटना याद आ जाती है. दादी ने कुछ नहीं कहा था लेकिन भाव कहीं से आ जाता है कि पानी की कद्र करनी चाहिए. वह जीवन के लिए जरूरी है.

    थार, इसकी नई पीढ़ी को पानी और इंसान की कद्र करना शायद नए सिरे से सीखना होगा. (साभार : ‘थार की ढ़ाणी’ के आलेख पर आधारित)