रंग गेंदे का
रंग गेंदे का

तिरने लगी फगुनहट

यह उतरता मा (माघ) है. कहते हैं कि इस बार पाळा इतना नहीं रहा. फिर भी जाती हुई सर्दी कभी-कभी रंग दिखा जाती है. राजस्‍थान के उत्‍तर-पश्चिमी इलाकों में दिन में भले ही गर्मी हो लेकिन रात सर्द होती है. सूरज की तेज तीखी होती किरणों और चांदनी की शीतलता का भारी अंतर मानवीव धैर्य का इम्‍तहान ले रहा है.

प्रभात में जब सूरज की किरणें पूर्व से पृथ्‍वी का आचमन करती तो उनकी गर्मी से भूमि भी धहकने लगती है. दोपहर में हालत यह कि कुछ देर धूप में बैठो तो कीडि़यां सी खाने लगें. दिन भर अरूण, पयोधर के साथ लुका-छिपी खेलते हैं और अपने स्‍वेद-बिंदु नक्षत्रालंकारों की चमक के साथ प्रकट हुई निशा के आंचल से पौंछ जाते हैं. शायद इसी कारण रात ज्‍यों-ज्‍यों ढलती है, उसका आंचल तराबोर होता जाता है. वायुमंडल में नमी चढ़ती है.

सुबह कहीं-कहीं जमे ओसकणों को देख लगता है जैसे लौटती निशा अपना आंचल निचोड़ गई हो. इसी कारण दिन ढलने से लेकर रात ढलने तक मौसम लगातार सर्द होता है. यह नमी दिन चढने तक तारी रहती है. यही इस मौसम की विविधता है.

लहसुन पकने को
लहसुन पकने को

लोग संभल रहे हैं कि कहीं जाती हुई सर्दी अपने रंग में रंग फाल्‍गुन को बैरंग न कर दे. इसी कारण जड़ावर शरीरों से जुड़े हैं और लोग बाग अभी अंदर ही सो रहे हैं. बाहर आंगन या बागळ में सोना शुरू नहीं किया है. जाती हुई सर्दी का डर जो है. स्‍वेटर, रजा‍इयां सिमटे नहीं हैं और गुदड़ी अभी भीतर वाली साळ में ही समेट कर रखी हुई है. बीच बीच में कई बार कुहरा भी मौसमी कैनवास पर अलग रंग बिखेर जाता है.

फागण यानी भारतीय लोकजीवन का सबसे रंग रंगीला महीना. फागण औपचारिक रूप से कुछ दिन बाद शुरू होगा लेकिन क्षेत्र में इसका खुलता रंग दिखने लगा है. शहरी कांकड़ से निकलते ही यह दिखता है. चित्‍त को खींचता है. रंग बदलती सरसों व कहीं कहीं दिखती कणक की नवपल्‍लवित बालियों के ऊपर फगुनहट तिरती दिखती है. इसकी गमक हर कहीं है. शांत स्थिर वसुंधरा से लेकर कलकल निश्‍चल बहती हवा तक में. जैसे जीवन का हर अंग फगुनहट में पगने लगा है.

इस समय सूर्य की गति का उत्‍तरायण काल है. पूर्व से निकल कर सूर्य अपने क्रांतिवृत्‍त में उत्‍तर की ओर खिसकता है. इस दौरान शरीर छोड़ने वालों की उर्ध्‍व गति होती है. बताते हैं कि सूर्य की दूसरी गति के इस काल की प्रतीक्षा में भीष्‍म पितामह लंबे समय तक शरशय्या पर लेटे रहे थे. कच्‍चे पक्‍के दिन, दो ऋतुओं का संधिकाल. सरसों की गांदलें कड़वी होने लगी हैं. बथुआ व पालक पक गई है. मूंगरे की फलियां पक गई हैं. छोले की कुट्टी बन रही है. थोड़े ही दिन में ‘होळे’ बनने लगेंगे. कुछ किसान गेहूं में खोदी वगैरह में लगे हैं, तो कुछ ने दांतियों के दांते निकलवा लिए हैं. जौ, बरसीम अभी है. कई घरों में कड़बी और डोके हैं. पशुओं के लिए खूब नीरा चारा है.

यत्र-तत्र, चौखूंट फागण के आने से पहले का रंग बिखरे हैं. कणक के क्‍यारों की डोळियों, खाळों से लेकर घरों के चूल्‍हे और हारों तक. छा (छाछ) अब ठंडी नहीं लगती और उसे डांगरों को पिलाने या बंटे में नहीं डालकर, संभाला जाने लगा है. कढ़ी में डालने के लिए गूंदली तैयार है, लहसुन के पत्‍ते भी. परंपराओं को मानने वाले घरों में इन दिनों सफेद चावल नहीं बन रहे हैं. वसंत पंचमी से लेकर शिवरात तक अगर चावल बनेंगे तो उनमें पीला रंग अवश्‍य डलेगा. ‘आई शिवरात धोळा होया भात’. ऐसी मान्‍यता है कि शिवरात्रि के बाद ही चावल सफेद होते हैं, यानी सादे-सफेद चावल बनते हैं. शिवरात्रि में अभी पखवाड़ा भर है.

जिन घरों में पळींडे बचे हैं, वहां उनकी लीपा पोती हो रही है. इंडुनी संभाली जाने लगी है. पौ मा की सर्दी में सिकुड़ा थार का जीवन इस फगुनहट को पीकर होली के रंग में नहाने को तैयार हो रहा है. (मेरी एक प्रस्‍तावित किताब के एक आलेख पर आधारित रपट, साभार.)

खेत खेत हरे �रे
खेत खेत हरे भरे