बेटियां ही बेटियां… पिछले कई महीनों से सोच रहा था कि इस बारे में बात की जाए. मेरे कई मित्रों ने 2008 को बेटियों का साल बताया. इस दौरान अनेक घरों में बेटियां आईं, बहुत से घरों में पहले बच्‍चे के रूप में बेटी आई. मेरे कार्यालय या मित्र मंडली में अधिकतर के यहां 2008 में बेटी हुई. जिनके यहां बेटी हुई वे खुश हैं. बेटी होने पर थाली भले ही नहीं बजती हो लेकिन पहले जैसे स्‍यापा भी नहीं होता. एक मित्र कह रहे थे कि परिवार में संतुलन के लिए कम से कम एक बेटी होना बहुत जरूरी है. वह परिवार में नैतिक व चारित्रिक रूप से संतुलन बनाती है और लडकियों के प्रति आम धारणा को तोडती है. कई लोग ऐसी बात कह रहे हैं.. आप इस खबर और बात पर क्‍या कहते हैं .. हमारी पहली पंचायत इसी तथ्‍य पर है.. अपने विचार रखिए हमें अच्‍छा लगेगा.