अनूपगढ़ वाया कल्‍याणकोट
मा (पौ मा वाले माघ) का महीना है. ठीक फागण से पहले का, जिसे भारतीय जनमानस का सबसे रंगीला महीना कहा जाता है. सूरतगढ़ से अनूपगढ़ जाने का मन तो बस से था लेकिन संयोग से ट्रेन लपक ली जो 2.45 बजे सूरतगढ़ से छूटती है. यह स्‍थानीय ट्रेन है जिसमें आसपास के लोग ही चढ़ते हैं.

भगवान सर, सरदारगढ़, सरूपसर जक्‍ंशन, रघुनाथ गढ, कल्‍याणकोट, बिजयनगर व रामसिंहपुर के बाद अनूपगढ़ स्‍टेशन आता है जो इस लाइन का सबसे अंतिम स्‍टेशन है. यह अंतरराष्‍ट्रीय सीमा के पास का प्रमुख स्‍टेशन है. यह ट्रेन यहीं से वापस लौटती है. सरदारगढ के बारे में सुना है कि यह मुस्लिम बहुल गांव है. स्‍टेशन पर देखता हूं दो युवतियों को जो हाथ मिला रही हैं. इनमें से एक ने जिंस शर्ट और दूसरी ने पारंपरिक सलवार कमीज पहन रखा है. दोनों एक दूसरे को विश कर हाथ मिलाती हैं. सलवार कमीज वाली युव‍ती वहां इन‍फील्‍ड बाइक के साथ खड़े बुजुर्ग के साथ बैठकर चली जाती है.

इस बार इलाके में उतनी सर्दी नहीं पड़ी बताते हैं फिर भी खेतों में खड़ी कणक (गेहूं) की फसल में उतना दम नहीं दिखता. हां सरसों बेहतर स्थिति में है. सूर्य का यह उत्‍तरायरण काल है. एक तरह से दो ऋतुओं का संधिकाल. दिन में गर्मी तो रात में अचानक सर्दी. आज सुबह भी खूब धुंध थी. अब धूप है जबकि आसमान में दूर कहीं सफेद बादल भी चमक रहे हैं. कणक, सरसों के साथ साथ कहीं कहीं कमाद (गन्‍ने), तारामीरा और चने की फसल भी दिखती है. पशुओं के चारे में रूप में बरसीम और जौ है. सरसों की गांदले पकने लगी हैं. यानी अब सरसों के साग के दिन अब बचे खुचे ही हैं. छोले की कुट्टी बन सकती है. मोगरा पकने लगा है. मूली भी. कई जगह लहसुन व प्‍याज की बाड़ी हैं.

अपनी समझ में यह नहीं आता कि हर रेलवे स्‍टेशन के बोर्ड पर समुद्र तल से ऊंचाई क्‍यों लिखा होता है. इन स्‍टेशनों पर निर्माण कार्य हो रहा है. अधिकतर स्‍टेशनों पर पानी के लिए बनी लोहे की पुरानी टंकियां काम में नहीं ली जा रहीं. कई जगह तो उन पर ‘प्रयोग में नहीं’ लिख दिया गया है.

पांच की पुली या उससे थोड़े आगे रेल लाईन के बाईं और जीबी नहर आ जाती है. उसके बाईं और सूरतगढ़-अनपूगढ़ सड़क है. यह घग्‍घर नदी का क्षेत्र है. इसी कारण नहर का नाम घग्‍घर ब्रांच (जीबी) रखा गया है. इस इलाके में आगे के अधिकतर चक जीबी ही हैं जैसे 32 जीबी, 40 जीबी आदि. पिछले दिनों हुई ओलोवृष्टि का असर श्री बिजयनगर के आसपास सरसों की फसल पर दिखता है.

छोटे छोटे स्‍टेशन हैं. कल्‍याण कोट पर रेल रुकती है. पास के रेलवे क्‍वार्टरों में कुछ परिवार बैठे धूप सेक रहे हैं. ट्रेन से कोई आवाज देता है और चारपाइयों पर बैठी एक युवती उठकर आती है. ट्रेन में शायद कोई रिश्‍तेदार है तो उसके सिर पर हाथ फेरकर दस बीस रुपये दे देता है. गांव में बच्‍चों विशेषकर लड़कियों के हाथ में रुपये देने की मान्‍यता है. इसे अच्‍छा माना जाता है.

बचपन में दूर के पेड़ साथ में दौड़ते हुए दिखते थे. अब नहीं. उम्र के साथ कुछ भ्रम दूर हो जाते हैं. शायद यही कारण है कि आनंद के कुछ ‘भ्रमित क्षण’ भी नहीं रहते.

रा‍मसिंहपुर स्‍टेशन से दायीं ओर एक भवन पर लिखा है कि इस ग्राम पंचायत को राष्‍ट्रपति से निर्मल ग्राम पंचायत का अवार्ड मिला है. कहते हैं कि यह इलाका कभी सरस्‍वती और दृषद्वती नदी का तट रहा. अब यहां मौसमी नदी घग्‍घर बहती है. घग्‍घर नदी, जीबी नहर, सूरतगढ-अनूपगढ़ सड़क और इस रेलमार्ग का यही अंतिम मोड़ है. घग्‍घर नदी यहां से पाकिस्‍तान में प्रवेश कर जाती है. जी बी नहर का यह अंतिम सिरा है. रेल खंड यहीं यानी अनूपगढ़ में समाप्‍त हो जाता है. सड़क मार्ग अनूपगढ़ से मुड़कर बीकानेर की ओर चला जाता है.

सवा चार बजे के आसपास ट्रेन अनूपगढ़ पहुंच जाती है. मौसम में फगुनहट की ठंडक सी है तारी हो रही है. यहीं से अपने को घड़साना के लिए बस पकड़नी है.
(31 जनवरी 2008, सूरतगढ़ से अनूपगढ़ की यात्रा करते हुए).